धान में यूरिया के साथ कौन सी खाद डालें? एक पौधे से भरपूर कल्ले निकालने का सही फॉर्मूला!

धान की फसल में ज्यादा और मजबूत कल्ले निकलना अच्छी पैदावार की बुनियाद माना जाता है। इसी वजह से किसान अक्सर कल्ले निकलने की अवस्था में यूरिया की टॉप ड्रेसिंग करते हैं। लेकिन केवल यूरिया डालने से हर खेत में मनचाहा परिणाम मिले, यह जरूरी नहीं है। फसल को नाइट्रोजन के साथ फास्फोरस, पोटाश और जरूरत के अनुसार जिंक जैसे पोषक तत्व भी चाहिए।

यूरिया के साथ क्या देना ज्यादा जरूरी है?

धान में कल्ले निकलने के समय नाइट्रोजन की मांग बढ़ती है और यूरिया इसका प्रमुख स्रोत है। लेकिन यूरिया अकेले डालने के बजाय खेत की मिट्टी और पहले दी गई खाद के हिसाब से पोषण का संतुलन रखना ज्यादा महत्वपूर्ण है। यदि खेत में जिंक की कमी है तो जिंक सल्फेट देना उपयोगी हो सकता है। वहीं पोटाश और फास्फोरस की जरूरत को पहले दी गई बेसल खाद तथा मिट्टी की जांच के आधार पर पूरा किया जाना चाहिए।

इसलिए यूरिया के साथ हर खेत में एक जैसी दूसरी खाद मिलाकर डालने का कोई सार्वभौमिक फॉर्मूला नहीं है। विशेष रूप से जिंक की कमी होने पर ही जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करना अधिक उचित है। मिट्टी में पहले से पर्याप्त जिंक होने पर बिना जरूरत जिंक डालने से अतिरिक्त लाभ की गारंटी नहीं होती।

कल्ले बढ़ाने के लिए नाइट्रोजन कब दें?

धान में नाइट्रोजन को एक ही बार में देने के बजाय अलग-अलग चरणों में देना अधिक प्रभावी तरीका माना जाता है। रोपाई वाले धान में नाइट्रोजन की एक निश्चित मात्रा शुरुआत में और शेष मात्रा कल्ले निकलने तथा बाद की फसल अवस्था के अनुसार दी जाती है। कई कृषि सलाहों में रोपाई के लगभग 20 से 30 दिन बाद कल्ले निकलने की अवस्था को नाइट्रोजन की टॉप ड्रेसिंग के महत्वपूर्ण समय के रूप में बताया गया है।

यूरिया डालने से पहले खेत में पानी की स्थिति भी देखना जरूरी है। बहुत अधिक पानी भरे खेत में यूरिया डालने से पोषक तत्वों की उपयोगिता घट सकती है। टॉप ड्रेसिंग के समय खेत में बहुत अधिक खड़ा पानी न रखने और खाद देने के बाद उचित सिंचाई प्रबंधन करने से नाइट्रोजन का बेहतर उपयोग हो सकता है।

जिंक की कमी हो तो यूरिया के साथ जिंक सल्फेट क्यों?

धान की खेती में जिंक की कमी कई क्षेत्रों में देखी जाती है। इसकी कमी होने पर पौधों की सामान्य बढ़वार प्रभावित हो सकती है और फसल का विकास कमजोर पड़ सकता है। ऐसे खेतों में जिंक सल्फेट का उपयोग फसल की पोषण आवश्यकता पूरी करने में मदद कर सकता है।

लेकिन जिंक सल्फेट को केवल कल्ले बढ़ाने के नाम पर हर खेत में डालना सही तरीका नहीं है। जिंक की आवश्यकता मिट्टी की स्थिति और फसल में दिखाई देने वाले लक्षणों के आधार पर तय करनी चाहिए। अलग-अलग जिंक उत्पादों में जिंक की मात्रा भी अलग हो सकती है, इसलिए केवल खाद के नाम के आधार पर मात्रा तय नहीं करनी चाहिए।

पोटाश और फास्फोरस का क्या काम है?

कल्ले निकलने के समय किसान का ध्यान अक्सर सिर्फ यूरिया पर रहता है, जबकि धान के संतुलित पोषण में पोटाश और फास्फोरस की भी भूमिका रहती है। फास्फोरस शुरुआती जड़ विकास और पौधे की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि पोटाश पौधे की मजबूती और आगे की उपज संबंधी प्रक्रियाओं में योगदान देता है।

इसी कारण सामान्य सिफारिशों में फास्फोरस और पोटाश का बड़ा हिस्सा खेत की तैयारी या बेसल खुराक के रूप में देने तथा नाइट्रोजन को बाद की अवस्थाओं में बांटकर देने की व्यवस्था मिलती है। अगर किसान पहले ही डीएपी या किसी अन्य एनपीके खाद से पर्याप्त फास्फोरस और पोटाश दे चुका है, तो बिना मिट्टी की स्थिति जाने दोबारा वही पोषक तत्व डालना जरूरी नहीं है।

एक पौधे से ज्यादा कल्ले निकालने का सही तरीका

किसी एक खाद को डालने से हर पौधे से निश्चित संख्या में कल्ले निकलने की गारंटी नहीं दी जा सकती। कल्लों की संख्या पर रोपाई की उम्र, पौधों की संख्या, दूरी, किस्म, मिट्टी की उर्वरता, पानी का प्रबंधन, खरपतवार और नाइट्रोजन की उपलब्धता जैसे कई कारकों का असर पड़ता है।

अच्छे कल्ले निकालने के लिए इन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:

  • रोपाई के समय स्वस्थ पौधों का इस्तेमाल करें और बहुत गहरी रोपाई से बचें।
  • नाइट्रोजन की मात्रा को फसल की जरूरत के अनुसार बांटकर दें, एक साथ जरूरत से ज्यादा यूरिया न डालें।
  • मिट्टी में जिंक की कमी होने पर ही अनुशंसित मात्रा में जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करें।
  • खेत में खरपतवार और पानी का सही प्रबंधन रखें, क्योंकि खरपतवार भी फसल के पोषक तत्वों का उपयोग करते हैं।

ज्यादा यूरिया डालने से कल्ले ज्यादा नहीं होंगे

यह समझना जरूरी है कि अधिक यूरिया का मतलब हमेशा अधिक कल्ले नहीं होता। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देने पर पौधे की अनावश्यक हरी बढ़वार हो सकती है और फसल के संतुलित विकास पर विपरीत असर पड़ सकता है। इससे खाद की लागत भी बढ़ती है और नाइट्रोजन का उपयोग कम प्रभावी हो सकता है।

हाल की कृषि सलाहों में भी यूरिया पर जरूरत से ज्यादा निर्भर रहने के बजाय मिट्टी की जांच और संतुलित उर्वरक प्रबंधन पर जोर दिया गया है। इसलिए किसान को केवल पौधे का रंग देखकर बार-बार यूरिया डालने के बजाय अपनी मिट्टी की पोषण स्थिति और फसल की अवस्था को ध्यान में रखना चाहिए।

खेत में खाद डालते समय पानी का रखें ध्यान

धान की फसल में खाद डालने के समय पानी का प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बहुत अधिक पानी भरे खेत में ऊपर से खाद डालने के बजाय उचित अवस्था में टॉप ड्रेसिंग करना बेहतर रहता है। कुछ कृषि सलाहों में टॉप ड्रेसिंग के समय खेत को अपेक्षाकृत सूखा रखने और खाद देने के बाद सिंचाई करने की सलाह दी गई है।

खासकर यूरिया के मामले में किसान को खाद डालने के तुरंत बाद खेत में अत्यधिक पानी भरने से बचना चाहिए। खेत की मिट्टी, मौसम और सिंचाई व्यवस्था के अनुसार पानी का प्रबंधन करने से खाद का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।

सबसे जरूरी बात क्या है?

अगर धान में कल्ले कम निकल रहे हैं तो केवल यूरिया की मात्रा बढ़ाना समाधान नहीं है। सबसे पहले यह देखना चाहिए कि फसल किस अवस्था में है, पहले कौन-कौन सी खाद दी जा चुकी है और मिट्टी में किस पोषक तत्व की कमी है। इसके बाद ही यूरिया, जिंक सल्फेट, पोटाश या किसी अन्य उर्वरक की जरूरत तय करनी चाहिए।

इस तरह धान में भरपूर कल्ले निकालने का सही फॉर्मूला किसी एक खाद का नाम नहीं, बल्कि सही समय पर संतुलित पोषण है। कल्ले निकलने की अवस्था में जरूरत के अनुसार यूरिया, जिंक की कमी होने पर जिंक सल्फेट और बाकी पोषक तत्वों की पूर्ति मिट्टी जांच तथा स्थानीय कृषि सिफारिश के अनुसार करने से फसल को बेहतर पोषण दिया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अधिक खाद डालने के बजाय सही खाद, सही मात्रा और सही समय पर देना ही धान की मजबूत और स्वस्थ फसल के लिए बेहतर रणनीति है।

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