गन्ना बुवाई से कटाई तक ये 3 परिवर्तन हमेशा निकलेगा 100 प्लस। Jayada ganna kaise nikaale

गन्ने में ज्यादा उत्पादन केवल अच्छी किस्म लगाने से नहीं मिलता। बुवाई से लेकर फसल की बढ़वार, सिंचाई, खाद, मिट्टी चढ़ाने और कटाई तक कई छोटे फैसले मिलकर अंतिम पैदावार तय करते हैं। अगर किसान 100 प्लस उत्पादन का लक्ष्य रखना चाहते हैं, तो खेती के तरीके में तीन महत्वपूर्ण बदलाव सबसे ज्यादा काम के हो सकते हैं।

पहला परिवर्तन: बुवाई में बीज और खेत की तैयारी पर दें पूरा ध्यान

गन्ने की अच्छी फसल की शुरुआत स्वस्थ बीज गन्ने और सही खेत तैयारी से होती है। कमजोर, रोगग्रस्त या खराब अंकुरण वाले गन्ने से शुरुआत करने पर खेत में पौधों की संख्या कम रह सकती है और बाद में अच्छी फसल तैयार करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए स्वस्थ और रोगमुक्त गन्ने से तैयार किए गए सेट्स का इस्तेमाल करना जरूरी है।

खेत की तैयारी में मिट्टी को अच्छी तरह भुरभुरी करने, खेत को समतल रखने और जल निकासी की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए। गन्ने की जड़ों के लिए ऐसी मिट्टी जरूरी है जिसमें पर्याप्त हवा और नमी दोनों उपलब्ध रहें। खेत में पानी लंबे समय तक खड़ा रहने से जड़ों को नुकसान हो सकता है।

बुवाई की दूरी भी बिना सोचे तय नहीं करनी चाहिए। क्षेत्र, मिट्टी, सिंचाई व्यवस्था और अपनाई जा रही विधि के अनुसार कतार की दूरी अलग हो सकती है। वैज्ञानिक सिफारिशों में कई परिस्थितियों के लिए लगभग 90 से 120 सेंटीमीटर की कतार दूरी का उल्लेख मिलता है। इसलिए अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसित दूरी को प्राथमिकता देना बेहतर है।

बुवाई के समय सबसे बड़ा लक्ष्य यह होना चाहिए कि पौधों का शुरुआती जमाव एकसमान हो। शुरुआत मजबूत होगी तो आगे कल्ले निकलने और गन्ने की संख्या बढ़ाने की संभावना भी बेहतर रहती है।

दूसरा परिवर्तन: खाद और पानी एक साथ नहीं, जरूरत के हिसाब से दें

गन्ना लंबे समय तक खेत में रहने वाली फसल है और इसकी पोषण जरूरत भी अधिक होती है। लेकिन अधिक उत्पादन के नाम पर एक साथ बहुत ज्यादा खाद डाल देना सही तरीका नहीं है। पोषक तत्वों की मात्रा खेत की मिट्टी, किस्म, फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि सिफारिशों के अनुसार तय करनी चाहिए।

विशेष रूप से नाइट्रोजन की पूरी मात्रा एक ही बार देने के बजाय कई चरणों में देने की व्यवस्था कई कृषि सिफारिशों में बताई गई है। इससे फसल की अलग-अलग बढ़वार अवस्थाओं में पोषण उपलब्ध कराया जा सकता है। फास्फोरस और पोटाश की जरूरत तथा उनका प्रयोग भी मिट्टी जांच और स्थानीय सिफारिश के आधार पर करना चाहिए।

सिंचाई में भी यही सिद्धांत लागू होता है। गन्ने को लगातार पानी में रखना जरूरी नहीं है, बल्कि फसल की अवस्था और मौसम के अनुसार पर्याप्त नमी बनाए रखना महत्वपूर्ण है। गर्म और सूखे समय में पानी की कमी फसल की बढ़वार को प्रभावित कर सकती है, जबकि बरसात में अतिरिक्त पानी की निकासी भी उतनी ही जरूरी है।

इसलिए दूसरे बड़े बदलाव को तीन बातों में समझा जा सकता है:

  • मिट्टी जांच और स्थानीय सिफारिश के आधार पर संतुलित खाद दें
  • फसल की अवस्था और मौसम देखकर सिंचाई करें, केवल कैलेंडर देखकर नहीं
  • खेत में पानी जमा होने की स्थिति में तुरंत जल निकासी की व्यवस्था रखें
  • उपलब्ध होने पर पानी बचाने वाली सिंचाई और फर्टिगेशन जैसी तकनीकों का उपयोग परिस्थितियों के अनुसार करें

तीसरा परिवर्तन: केवल पौधा खड़ा करना नहीं, पूरे खेत का प्रबंधन करें

कई बार किसान बुवाई और खाद देने के बाद फसल को लगभग अपने हाल पर छोड़ देते हैं। यही वह जगह है जहां तीसरा बड़ा बदलाव जरूरी है। गन्ने की अच्छी पैदावार के लिए खरपतवार नियंत्रण, मिट्टी चढ़ाना, कीट और रोगों की निगरानी तथा समय पर खेत निरीक्षण लगातार करना पड़ता है।

गन्ने की शुरुआती अवस्था में खरपतवार पौधों के साथ पानी, पोषक तत्व और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसलिए खेत को लंबे समय तक खरपतवार से मुक्त रखना जरूरी है। खरपतवार नियंत्रण का तरीका खेत, फसल की अवस्था और स्थानीय सिफारिश के अनुसार तय किया जाना चाहिए।

मिट्टी चढ़ाने की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण है। उपयुक्त समय पर मिट्टी चढ़ाने से जड़ों को बेहतर सहारा मिलता है और बढ़ती फसल के गिरने की समस्या को कम करने में मदद मिल सकती है। कृषि सलाह में गन्ने की अवस्था के अनुसार आंशिक और पूर्ण मिट्टी चढ़ाने की सिफारिश की जाती है।

इसके साथ खेत में लगातार निगरानी जरूरी है। टॉप बोरर, अर्ली शूट बोरर जैसे कीट और लाल सड़न तथा स्मट जैसी बीमारियां दिखाई देने पर समय पर पहचान और नियंत्रण करना चाहिए। रोगग्रस्त पौधों को खेत में छोड़ देना आगे नुकसान बढ़ा सकता है।

100 प्लस उत्पादन के लक्ष्य में इन तीन बदलावों का क्या महत्व है

100 प्लस उत्पादन को किसी एक दवा, खाद या तकनीक से जोड़ना सही नहीं होगा। गन्ने की वास्तविक पैदावार पर किस्म, मिट्टी, मौसम, पानी, पौधों की संख्या, पोषण, कीट-रोग और खेती की पूरी व्यवस्था का संयुक्त प्रभाव पड़ता है।

किसान अगर केवल ज्यादा खाद डालकर उत्पादन बढ़ाने की कोशिश करते हैं तो जरूरी नहीं कि उन्हें अपेक्षित परिणाम मिले। इसी तरह केवल अधिक सिंचाई करना भी उत्पादन बढ़ाने की गारंटी नहीं है। सही पौध संख्या बनाए रखना, स्वस्थ शुरुआत करना और पूरी फसल अवधि में समय पर प्रबंधन करना अधिक महत्वपूर्ण है।

उत्तर भारत में गन्ने की खेती के लिए ट्रेंच जैसी बेहतर रोपण विधियों और पानी बचाने वाली तकनीकों पर भी काम हुआ है। कुछ परिस्थितियों में इन तकनीकों से पारंपरिक व्यवस्था की तुलना में उत्पादन में सुधार दर्ज किया गया है, लेकिन इसका परिणाम खेत और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है।

कटाई तक एक गलती पूरी मेहनत पर भारी पड़ सकती है

गन्ने की फसल जब कटाई के लिए तैयार हो जाए तो कटाई का समय भी महत्वपूर्ण है। बहुत पहले कटाई करने से फसल को अपनी पूरी बढ़वार और गुणवत्ता विकसित करने का पर्याप्त समय नहीं मिल सकता, जबकि अनावश्यक देरी भी उचित नहीं होती। इसलिए स्थानीय किस्म, मौसम और मिल की कटाई व्यवस्था के अनुसार उचित समय तय करना चाहिए।

कटाई के समय गन्ने को जमीन के पास से उचित तरीके से काटना और कटे हुए गन्ने को अनावश्यक रूप से खेत या रास्ते में लंबे समय तक न छोड़ना भी महत्वपूर्ण है। कटाई के बाद की देरी गन्ने की गुणवत्ता और चीनी रिकवरी पर असर डाल सकती है।

यही वजह है कि ज्यादा गन्ना निकालने की योजना केवल बुवाई के दिन से शुरू होकर फसल खड़ी होने तक नहीं चलती। इसका आखिरी चरण कटाई और कटे हुए गन्ने के सही प्रबंधन तक जाता है।

निष्कर्ष

गन्ने में 100 प्लस उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने के लिए कोई एक जादुई उपाय नहीं है। असली बदलाव खेती की पूरी प्रक्रिया को बेहतर बनाने में है। पहला बदलाव स्वस्थ बीज और सही खेत तैयारी, दूसरा संतुलित खाद और जरूरत के अनुसार सिंचाई तथा तीसरा लगातार खेत निगरानी, खरपतवार नियंत्रण, मिट्टी चढ़ाने और कीट-रोग प्रबंधन का होना चाहिए।

इन तीनों को सही समय पर अपनाने से फसल की क्षमता का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। हालांकि 100 प्लस उत्पादन हर खेत में निश्चित रूप से मिलेगा, ऐसा दावा करना सही नहीं होगा, क्योंकि अंतिम परिणाम मिट्टी, किस्म, मौसम, पानी और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। किसान का लक्ष्य यह होना चाहिए कि बुवाई से कटाई तक किसी भी महत्वपूर्ण चरण में लापरवाही न हो और हर निर्णय खेत की वास्तविक जरूरत के अनुसार लिया जाए।

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