सोयाबीन में फलियां बनते समय भूलकर भी ना करें ये गलतियां / Soybean ki kheti / Soybean farming

सोयाबीन की फसल में फलियां बनना उपज तय करने वाले सबसे अहम चरणों में से एक माना जाता है। इस समय पौधे पर पानी की कमी, कीटों का प्रकोप या पोषक तत्वों का असंतुलन होने पर बनने वाली फलियों और दानों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

यही वजह है कि फलियां बनते समय किसान को खेत में लगातार निगरानी रखने की जरूरत होती है। कुछ सामान्य गलतियां ऐसी हैं जिन्हें समय रहते रोकना जरूरी है।

फलियां बनते समय पानी की कमी न होने दें

सोयाबीन में फूल आने और फलियां बनने का समय नमी के लिहाज से महत्वपूर्ण चरण है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की खरीफ कृषि सलाह में भी फूल और फलियां बनने के समय पानी की कमी को फसल के लिए महत्वपूर्ण जोखिम बताया गया है और जरूरत के अनुसार सिंचाई की सलाह दी गई है।

इसलिए केवल यह सोचकर खेत को सूखने देना सही नहीं है कि सोयाबीन खरीफ की वर्षा आधारित फसल है। यदि इस चरण में लंबे समय तक बारिश नहीं होती और खेत में मिट्टी की नमी काफी कम हो जाती है, तो उपलब्ध सिंचाई सुविधा और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आवश्यक सिंचाई पर विचार करना चाहिए।

दूसरी तरफ खेत में पानी जमा करना भी ठीक नहीं है। लगातार जलभराव से पौधों की जड़ों का वातावरण खराब हो सकता है। इसलिए बारिश के बाद खेत से अतिरिक्त पानी निकलने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।

फलियां बनते समय कीटों की अनदेखी न करें

फलियां बनने के दौरान खेत में केवल पौधों का हरा-भरा दिखाई देना पर्याप्त नहीं है। पत्तियों, तनों और फलियों को ध्यान से देखकर कीटों तथा रोगों के शुरुआती लक्षणों की पहचान करनी चाहिए।

सोयाबीन में तना मक्खी, गर्डल बीटल और पत्तियां खाने वाले कीटों सहित कई कीट फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में फली और दाने के विकास पर भी असर पड़ सकता है। इसलिए खेत का नियमित निरीक्षण करके समस्या की शुरुआत में ही प्रबंधन करना बेहतर रहता है।

कीट दिखाई देने पर बिना पहचान किए बार-बार कोई भी कीटनाशक डालना सही तरीका नहीं है। जरूरत के अनुसार ही अनुशंसित दवा और निर्धारित मात्रा का इस्तेमाल करना चाहिए। अत्यधिक या अनावश्यक छिड़काव से लागत बढ़ने के साथ उपयोगी जीवों पर भी असर पड़ सकता है।

जरूरत से ज्यादा खाद या नाइट्रोजन डालने की गलती न करें

फलियां देखकर कई किसान पौधे को और ताकत देने के लिए अपनी तरफ से भारी मात्रा में नाइट्रोजन या दूसरी खाद डालने की कोशिश करते हैं। यह तरीका हमेशा सही नहीं होता।

सोयाबीन दलहनी फसल है और इसकी पोषण जरूरतों को फसल की अवस्था, मिट्टी की स्थिति तथा पहले किए गए उर्वरक प्रबंधन के अनुसार देखना चाहिए। ICAR की कृषि सलाह में भी सोयाबीन में संतुलित पोषण पर जोर दिया गया है और बिना जरूरत अत्यधिक नाइट्रोजन देने की सलाह नहीं दी गई है।

फलियां बनते समय किसी पोषक तत्व की कमी का संदेह हो तो पहले खेत की स्थिति, मिट्टी और फसल के लक्षणों को समझना जरूरी है। केवल अनुमान के आधार पर कई तरह की खाद या घुलनशील उर्वरक एक साथ डालने से बचना चाहिए।

पत्तियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों पर नजर रखें

सोयाबीन में दाने भरने के लिए पौधे की स्वस्थ पत्तियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि इस समय पत्तियों को खाने वाले कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है और बड़ी मात्रा में पत्तियां क्षतिग्रस्त होती हैं, तो पौधे की सामान्य वृद्धि और दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

इसलिए फलियां बनने के समय खेत में चलते हुए कुछ पौधों को ध्यान से देखना चाहिए। पत्तियों में छेद, पत्तियों का तेजी से कम होना, इल्ली की मौजूदगी या अन्य असामान्य लक्षण दिखाई दें तो समस्या की पहचान कर उचित प्रबंधन करना चाहिए।

किसी कीट के दिखाई देने मात्र से तुरंत छिड़काव शुरू करना भी सही नहीं है। कीट की पहचान और प्रकोप की स्थिति के अनुसार निर्णय लेना अधिक सुरक्षित और प्रभावी रहता है। सोयाबीन के लिए एकीकृत कीट प्रबंधन में निगरानी और जरूरत के आधार पर नियंत्रण उपायों पर जोर दिया जाता है।

फलियां बनते समय ये गलतियां बिल्कुल न करें

इस अवस्था में किसान को खेत की नियमित निगरानी के साथ कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सबसे जरूरी गलतियां इस प्रकार हैं:

  • लंबे समय तक नमी की कमी रहने पर भी खेत की स्थिति की अनदेखी करना।
  • बारिश के बाद खेत में पानी जमा रहने देना।
  • कीट की पहचान किए बिना बार-बार कीटनाशक का छिड़काव करना।
  • जरूरत जाने बिना अतिरिक्त खाद या नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ा देना।

इनमें से किसी भी गलती का असर केवल पौधे की हरियाली पर नहीं, बल्कि आगे बनने वाले दानों की स्थिति पर भी पड़ सकता है। इसलिए इस समय खेत में किए जाने वाले प्रत्येक काम का निर्णय फसल की वास्तविक जरूरत देखकर करना चाहिए।

फलियों के समय खेत की निगरानी कैसे रखें

फलियां बनते समय किसान को पूरे खेत में एक साथ केवल दूर से देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। अलग-अलग हिस्सों में पौधों को नजदीक से देखकर पत्तियों, तने, फूलों और फलियों की स्थिति जांचना उपयोगी रहता है।

यदि किसी हिस्से में पौधे कमजोर दिखाई दे रहे हैं, पत्तियां असामान्य हैं या फलियों का विकास ठीक नहीं लग रहा है, तो उस हिस्से को विशेष रूप से जांचना चाहिए। इसी तरह बारिश के बाद खेत में जलभराव वाले स्थानों और लंबे समय तक सूखे रहने वाले हिस्सों पर भी ध्यान देना चाहिए।

फलियों के बाद दाना भरने की अवस्था आती है, इसलिए इस समय पौधे को अनावश्यक तनाव से बचाना महत्वपूर्ण है। अच्छी नमी व्यवस्था, संतुलित पोषण और समय पर कीट-रोग निगरानी फसल प्रबंधन का आधार बने रहते हैं।

निष्कर्ष

सोयाबीन में फलियां बनना ऐसी अवस्था है जब किसान की छोटी सी लापरवाही आगे चलकर उपज पर असर डाल सकती है। इस समय सबसे बड़ी गलतियों में खेत में नमी की कमी को नजरअंदाज करना, जलभराव को बने रहने देना, कीटों की निगरानी न करना और बिना जरूरत खाद या कीटनाशक का इस्तेमाल करना शामिल है।

किसान को इस अवस्था में खेत का नियमित निरीक्षण करना चाहिए और समस्या दिखाई देने पर उसकी सही पहचान के बाद ही प्रबंधन करना चाहिए। स्थानीय मौसम, मिट्टी और फसल की स्थिति को ध्यान में रखकर किया गया संतुलित प्रबंधन ही सोयाबीन की फलियों और दानों के बेहतर विकास में मदद कर सकता है।

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