सरसों की खेती में अच्छी पैदावार की शुरुआत बुवाई के सही तरीके से होती है। खेत की तैयारी, सही समय पर बुवाई, उचित बीज दर, किस्म का चुनाव और संतुलित खाद का इस्तेमाल फसल की शुरुआती बढ़वार को काफी प्रभावित करता है।
अगर किसान शुरुआत में इन बातों का ध्यान रखता है तो खेत में पौधों की संख्या बेहतर रहती है और आगे चलकर सिंचाई, पोषण तथा कीट-रोग प्रबंधन करना भी आसान हो जाता है।
सरसों की बुवाई का सही समय
सरसों की बुवाई का समय क्षेत्र, किस्म, सिंचाई की सुविधा और मौसम के अनुसार थोड़ा बदल सकता है। उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों के लिए सामान्य तौर पर अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े में वर्षा आधारित परिस्थितियों में तथा नवंबर के पहले पखवाड़े में सिंचित परिस्थितियों में बुवाई का समय उपयुक्त माना गया है। समय पर बुवाई करने से पौधों को फसल की शुरुआती अवस्था में अनुकूल तापमान मिलने में मदद मिलती है।
बहुत अधिक देरी से बुवाई करने पर फसल की बढ़वार और उपज प्रभावित हो सकती है। इसलिए किसान को धान या खरीफ की पिछली फसल की कटाई के बाद खेत की तैयारी जल्द पूरी करने पर ध्यान देना चाहिए।
खेत की तैयारी और बुवाई का सबसे अच्छा तरीका
सरसों के लिए खेत की मिट्टी भुरभुरी और अच्छी तरह तैयार होनी चाहिए। खेत में बड़े ढेले रहने पर बीज का जमाव समान नहीं हो पाता। वहीं बहुत ज्यादा बारीक मिट्टी या जरूरत से अधिक जुताई भी हमेशा फायदेमंद नहीं होती। उपलब्ध नमी को ध्यान में रखते हुए खेत को ऐसी स्थिति में तैयार करना बेहतर रहता है जिसमें बीज को पर्याप्त नमी और मिट्टी का अच्छा संपर्क मिल सके।
सरसों की लाइन में बुवाई छिटकवां बुवाई की तुलना में पौधों की दूरी और संख्या को नियंत्रित करने में अधिक मदद करती है। सामान्य परिस्थितियों में बीज की मात्रा लगभग 3 से 4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर रखी जा सकती है, जबकि किस्म और बुवाई की स्थिति के अनुसार सिफारिश अलग हो सकती है। सामान्यतः पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर के आसपास रखी जाती है।
बुवाई के बाद खेत में कहीं बहुत अधिक पौधे और कहीं बहुत कम पौधे नहीं होने चाहिए। जरूरत पड़ने पर शुरुआती अवस्था में पौधों की छंटाई करके उचित पौध संख्या बनाए रखना जरूरी है। ICAR की कृषि सलाह में भी बुवाई के करीब 25 से 30 दिन बाद thinning यानी अतिरिक्त पौधों को हटाकर उचित पौध संख्या बनाए रखने की सलाह दी गई है।
सरसों की अच्छी किस्म का चुनाव कैसे करें
सरसों में केवल ऐसी किस्म को चुनना सही नहीं है जिसे किसान बाजार में सबसे ज्यादा चर्चित बता रहे हों। अच्छी किस्म वही है जो आपके क्षेत्र, बुवाई के समय, सिंचाई की स्थिति और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के लिए अनुशंसित हो।
हाल के वर्षों में सरसों की नई किस्मों और संकरों पर भी काम हुआ है। उदाहरण के तौर पर NRCHB-506 को समय पर बोई जाने वाली सरसों के लिए राजस्थान और उत्तर प्रदेश में अनुशंसित बताया गया है। इसी तरह DRMRIJ-31 यानी गिरिराज को समय पर बुवाई के लिए राजस्थान, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में अनुशंसित किया गया है।
BPM-11 भी एक उन्नत भारतीय सरसों किस्म है, जिसे कई राज्यों में खेती के लिए अनुशंसित किया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि ये सभी किस्में हर खेत और हर जिले के लिए समान रूप से सबसे अच्छी रहेंगी। बीज खरीदते समय अपने क्षेत्र के लिए अनुशंसा और प्रमाणित बीज की उपलब्धता को प्राथमिकता देना जरूरी है।
सरसों में कौन सी खाद डालें
सरसों तिलहनी फसल है और इसके लिए संतुलित पोषण जरूरी है। केवल यूरिया डालने से फसल की पूरी पोषण जरूरत पूरी नहीं होती। नाइट्रोजन के साथ फास्फोरस, पोटाश और सल्फर जैसे पोषक तत्व भी महत्वपूर्ण हैं। खाद की वास्तविक मात्रा मिट्टी की जांच, फसल की स्थिति और स्थानीय सिफारिश के अनुसार तय करना बेहतर रहता है।
समय पर बोई गई फसल के लिए एक सामान्य उर्वरक सिफारिश में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा क्रमशः 80, 40 और 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बताई गई है। देर से बोई गई फसल में यह मात्रा अलग हो सकती है। इसी तकनीकी सिफारिश में सल्फर के साथ जिंक और बोरॉन की आवश्यकता होने पर उनके उपयोग का भी उल्लेख है।
खाद प्रबंधन में सबसे जरूरी बात यह है कि किसान अपनी मिट्टी की जरूरत को समझे और बिना आवश्यकता के किसी पोषक तत्व की अधिक मात्रा न डाले।
सरसों में खाद डालते समय इन बातों का ध्यान रखना उपयोगी रहता है:
- खाद की मात्रा मिट्टी की जांच और स्थानीय अनुशंसा के आधार पर तय करें।
- नाइट्रोजन की पूरी मात्रा एक साथ देने के बजाय फसल और सिंचाई की स्थिति के अनुसार विभाजित मात्रा में देना बेहतर हो सकता है।
- फास्फोरस और पोटाश की जरूरत को नजरअंदाज न करें।
- सल्फर की कमी वाले खेतों में सल्फरयुक्त उर्वरक का उपयोग फसल की पोषण जरूरत पूरी करने में मदद कर सकता है।
सिंचाई और शुरुआती फसल प्रबंधन
सरसों में सिंचाई की जरूरत खेत की नमी, मिट्टी, वर्षा और बुवाई की स्थिति पर निर्भर करती है। पर्याप्त नमी होने पर अनावश्यक सिंचाई से बचना चाहिए, जबकि नमी की कमी होने पर फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं पर सिंचाई उपयोगी हो सकती है। ICAR की कृषि सलाह में सिंचाई से सरसों की उपज में सुधार होने की बात कही गई है।
बुवाई के बाद सबसे पहले समान अंकुरण और उचित पौध संख्या पर ध्यान देना चाहिए। इसके बाद खेत में खरपतवार की स्थिति देखते हुए समय पर नियंत्रण करना जरूरी है। सरसों में माहू, अल्टरनेरिया झुलसा और सफेद रतुआ जैसे प्रमुख कीट एवं रोग समस्या पैदा कर सकते हैं, इसलिए खेत की नियमित निगरानी जरूरी है।
फसल में फूल आने के समय विशेष रूप से खेत का निरीक्षण करते रहना चाहिए। किसी कीट या रोग की समस्या दिखाई देने पर उसकी पहचान के अनुसार ही नियंत्रण उपाय अपनाना चाहिए। बिना समस्या की पहचान किए बार-बार दवा का छिड़काव करना उचित तरीका नहीं है।
ज्यादा पैदावार के लिए किन बातों पर रखें ध्यान
सरसों में अच्छी उपज केवल एक खाद या एक किस्म से तय नहीं होती। बुवाई का समय, बीज की गुणवत्ता, पौधों की उचित संख्या, पोषण, नमी और फसल की निगरानी सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि शुरुआत में सही प्रबंधन करने वाले किसान को आगे की फसल संभालने में भी आसानी होती है।
सरसों की खेती में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान अपने क्षेत्र के अनुसार अनुशंसित किस्म और उत्पादन तकनीक अपनाए। हाल में ICAR के सरसों अनुसंधान कार्यक्रम में भी उन्नत किस्मों, बेहतर पोषण प्रबंधन, कीट-रोग नियंत्रण और बदलते मौसम के अनुसार फसल प्रबंधन पर जोर दिया गया है।
निष्कर्ष
सरसों की सफल खेती के लिए बुवाई की शुरुआत ही सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक है। खेत की सही तैयारी, समय पर लाइन में बुवाई, उचित बीज दर और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उन्नत किस्म का चयन फसल की नींव मजबूत करता है। इसके बाद मिट्टी की जरूरत के अनुसार संतुलित खाद, पर्याप्त नमी और नियमित निगरानी रखी जाए तो फसल की क्षमता का बेहतर उपयोग किया जा सकता है।
इसलिए सरसों की खेती में केवल ज्यादा बीज या ज्यादा यूरिया डालने को अच्छी खेती न समझें। सही समय पर सही किस्म, सही पौध संख्या और संतुलित पोषण का तालमेल ही बेहतर फसल प्रबंधन का आधार है।