देवघर में खेती के क्षेत्र में इंटरक्रॉपिंग यानी सहफसली खेती को लेकर किसानों की रुचि बढ़ रही है। एक ही खेत में पपीते के साथ हल्दी जैसी फसल को शामिल करना भूमि के बेहतर उपयोग का विकल्प बन सकता है। कृषि संबंधी प्रशिक्षण सामग्री में भी पपीते के साथ हल्दी को सहफसल के रूप में लेने का उल्लेख मिलता है।
हालांकि देवघर के जिस किसान के नाम से यह खास मामला सामने आया है, उसकी खेती का रकबा, उत्पादन और आमदनी से जुड़े सटीक आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध स्रोतों से नहीं हो सकी है। इसलिए इन आंकड़ों को तथ्य के रूप में बताना उचित नहीं होगा।
एक खेत में दो फसलों का मॉडल
इंटरक्रॉपिंग में एक ही खेत में दो या उससे अधिक फसलों को इस तरह लगाया जाता है कि उपलब्ध जमीन, पानी, पोषक तत्व और धूप का बेहतर इस्तेमाल हो सके। पपीते के खेत में हल्दी को शामिल करने का विचार इसी तरह की सहफसली व्यवस्था से जुड़ा है।
हल्दी जमीन के निचले हिस्से में विकसित होने वाली फसल है, जबकि पपीता ऊंचाई पर बढ़ता है। हल्दी कुछ हद तक छाया सहन कर सकती है, इसी वजह से इसे विभिन्न फलदार फसलों के साथ अंतरवर्ती फसल के रूप में लेने की संभावना बताई गई है।
पपीते के साथ हल्दी क्यों ली जा सकती है
पपीते के पौधों के बीच उपलब्ध खाली स्थान का इस्तेमाल करने के लिए किसान हल्दी जैसी फसल को शामिल कर सकते हैं। इससे एक ही खेत में अलग-अलग फसलों से उत्पादन लेने की योजना बनाई जा सकती है।
NITI Aayog की प्राकृतिक खेती प्रशिक्षण सामग्री में पपीते के साथ हल्दी, अदरक, अरहर, मिर्च, प्याज और कुछ अन्य फसलों को सहफसल के रूप में लेने का उल्लेख है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर क्षेत्र में सभी फसलों का संयोजन समान रूप से सफल होगा। मिट्टी, मौसम, पानी और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुसार फसल संयोजन तय करना जरूरी है।
देवघर के किसानों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह तरीका
देवघर और आसपास के क्षेत्रों में किसान पारंपरिक फसलों के साथ बागवानी और सब्जी उत्पादन की ओर भी बढ़ रहे हैं। हाल की रिपोर्टों में जिले में पपीते की व्यावसायिक खेती को लेकर किसानों की रुचि का उल्लेख भी सामने आया है।
सहफसली खेती का एक फायदा यह हो सकता है कि किसान एक ही जमीन पर अलग-अलग फसलों से उत्पादन लेने की योजना बना सके। इससे किसी एक फसल पर पूरी निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है, हालांकि वास्तविक आर्थिक लाभ बाजार भाव, उत्पादन लागत और फसल की उपज पर निर्भर करता है।
पपीते की खेती में वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी
पपीते की फसल के लिए खेत की जल निकासी, पौधों की दूरी, पोषक तत्व और रोग प्रबंधन महत्वपूर्ण हैं। ICAR के अनुसार पूर्वी भारत की परिस्थितियों में पपीते के लिए वैज्ञानिक उत्पादन तकनीक अपनाने पर जोर दिया जाता है।
पपीते के साथ हल्दी लगाने वाले किसान को दोनों फसलों की जरूरतों को ध्यान में रखकर खेत की योजना बनानी चाहिए। बहुत अधिक घनी खेती करने से हवा और रोशनी का आवागमन प्रभावित हो सकता है। इसलिए फसल संयोजन तय करते समय स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह उपयोगी रहती है।
हल्दी की फसल के लिए भी सही प्रबंधन जरूरी
हल्दी को अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी और पर्याप्त नमी की जरूरत होती है। फसल के दौरान खरपतवार नियंत्रण और पोषक तत्व प्रबंधन पर ध्यान देना जरूरी है।
हल्दी की सहफसली खेती कोई पूरी तरह नया प्रयोग नहीं है। कृषि संबंधी सरकारी सामग्री में इसे फलदार फसलों के साथ अंतरवर्ती फसल के रूप में लेने की संभावना बताई गई है।
इंटरक्रॉपिंग से किसान को क्या फायदा हो सकता है
एक ही खेत में दो फसलों की योजना बनाने से भूमि के अलग-अलग स्तरों का इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि फसलों का चयन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किया जाए तो किसान को उत्पादन और आय के अलग-अलग स्रोत मिल सकते हैं।
- उपलब्ध खेत का अधिक प्रभावी इस्तेमाल किया जा सकता है।
- एक फसल के साथ दूसरी फसल से भी उत्पादन लेने का अवसर मिलता है।
- फसल विविधीकरण से केवल एक फसल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
- अलग-अलग फसलों की कटाई और बिक्री अलग समय पर होने से कृषि गतिविधियों को बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकता है।
किसान बिना जानकारी के न अपनाएं यह मॉडल
इंटरक्रॉपिंग में केवल दो फसलों को एक साथ लगा देना पर्याप्त नहीं है। पौधों की दूरी, पानी, खाद, रोशनी, खरपतवार और रोग प्रबंधन जैसे विषयों की पहले से योजना बनानी पड़ती है।
इसलिए देवघर के किसान पपीता और हल्दी को एक साथ लगाने से पहले अपने खेत की मिट्टी, सिंचाई सुविधा और स्थानीय मौसम के अनुसार कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विशेषज्ञ से सलाह ले सकते हैं। खासकर बड़े क्षेत्र में खेती शुरू करने से पहले छोटे क्षेत्र में मॉडल को समझना उपयोगी हो सकता है।
देवघर में पपीते के साथ हल्दी की सहफसली खेती का विचार किसानों के लिए खेती में विविधता और भूमि के बेहतर इस्तेमाल का एक विकल्प हो सकता है। सरकारी कृषि प्रशिक्षण सामग्री भी पपीते के साथ हल्दी को सहफसल के रूप में लेने की संभावना बताती है। हालांकि जिस खास किसान की कहानी के आधार पर यह शीर्षक बनाया गया है, उसके उत्पादन, रकबे और कमाई के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन दावों को आधिकारिक पुष्टि के बिना निश्चित तथ्य मानना उचित नहीं होगा।