फसल में अचानक कीट और बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाए तो किसान अक्सर सीधे दवा के छिड़काव पर ध्यान देते हैं। लेकिन कई बार समस्या की शुरुआत खेत में की गई कुछ सामान्य गलतियों से होती है। सही समय पर इन कारणों को समझकर खेती की व्यवस्था सुधारी जाए तो फसल पर कीट और रोग का दबाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।
पहला बड़ा कारण: खेत की साफ-सफाई पर ध्यान न देना
खेत में पिछली फसल के संक्रमित अवशेष, खरपतवार और रोगग्रस्त पौधों को छोड़ देना कीट और बीमारियों के लिए अनुकूल स्थिति बना सकता है। कई रोगजनक और कुछ कीटों की अवस्थाएं फसल के अवशेष, मिट्टी या खेत के आसपास मौजूद पौधों पर बनी रह सकती हैं। अगली फसल लगने के बाद यही संक्रमण या कीट दोबारा फसल तक पहुंच सकते हैं।
इसलिए केवल खड़ी फसल की देखभाल करना पर्याप्त नहीं है। खेत की तैयारी के समय पुराने संक्रमित पौधों और फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन भी जरूरी है। खेत की मेड़ और आसपास उगने वाले ऐसे खरपतवार भी समस्या बढ़ा सकते हैं जो कीटों या रोगों के वैकल्पिक आश्रय बनते हैं।
विशेषज्ञ सलाह में खेत की स्वच्छता, संक्रमित हिस्सों को हटाने और शुरुआती अवस्था में खेत की नियमित निगरानी को कीट एवं रोग प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि फसल में समस्या फैलने से पहले ही उसके शुरुआती स्रोत को कम किया जा सके।
दूसरा बड़ा कारण: खाद और पानी का असंतुलित इस्तेमाल
फसल को स्वस्थ रखने के लिए पोषक तत्व और पानी दोनों जरूरी हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा या असंतुलित मात्रा में इनका इस्तेमाल फसल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। खासकर बिना मिट्टी की स्थिति समझे बार-बार उर्वरक डालने की आदत पौधों के संतुलित विकास को प्रभावित कर सकती है।
अत्यधिक नाइट्रोजन की स्थिति में कई फसलों में पौधों की कोमल हरी बढ़वार बढ़ सकती है, जिससे कुछ रस चूसने वाले कीटों के लिए अनुकूल परिस्थिति बनती है। वहीं पानी का गलत प्रबंधन, जलभराव या खेत में लंबे समय तक अत्यधिक नमी रहने से कुछ रोगों का जोखिम बढ़ सकता है।
इसलिए खाद का इस्तेमाल फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार करना ज्यादा सुरक्षित तरीका है। मिट्टी परीक्षण के आधार पर पोषक तत्वों की जरूरत तय करना और संतुलित पोषण देना बेहतर माना जाता है। पानी की निकासी भी ऐसी होनी चाहिए कि खेत में अनावश्यक रूप से पानी जमा न रहे।
तीसरा बड़ा कारण: कीट या रोग दिखने के बाद बहुत देर से कार्रवाई करना
कई किसान तब ध्यान देते हैं जब पत्तियों पर बड़ी संख्या में कीट दिखाई देने लगते हैं या बीमारी के लक्षण पूरे खेत में फैलने लगते हैं। इस स्थिति में नियंत्रण कठिन हो सकता है और नुकसान पहले ही काफी बढ़ चुका होता है।
कीट एवं रोग प्रबंधन में नियमित निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण है। खेत में पौधों की पत्तियों, तनों, नई बढ़वार और अन्य प्रभावित हिस्सों को समय-समय पर देखना चाहिए। शुरुआत में कुछ पौधों पर दिखाई देने वाले असामान्य लक्षण पूरे खेत की समस्या का संकेत हो सकते हैं।
हर बार केवल कीटनाशक या फफूंदीनाशक का छिड़काव ही पहला कदम नहीं होना चाहिए। पहले यह पहचानना जरूरी है कि समस्या वास्तव में कीट की है, रोग की है, पोषक तत्वों की कमी की है या किसी अन्य कारण से पौधे प्रभावित हो रहे हैं। गलत समस्या के लिए गलत दवा का इस्तेमाल खर्च बढ़ा सकता है और अपेक्षित परिणाम नहीं देता।
इन 3 गलतियों से किसान बचें
फसल में कीट और बीमारी का दबाव कम रखने के लिए खेती के शुरुआती चरण से ही कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है।
- संक्रमित पौधों और फसल अवशेषों को खेत में लापरवाही से न छोड़ें।
- बिना जरूरत या बिना संतुलन के नाइट्रोजन और अन्य उर्वरकों का इस्तेमाल न करें।
- खेत में पानी जमा रहने की स्थिति को नजरअंदाज न करें।
- कीट या रोग की पहचान किए बिना बार-बार रासायनिक दवाओं का छिड़काव न करें।
केवल दवा पर निर्भर रहने के बजाय अपनाएं एकीकृत तरीका
कीट और बीमारी को नियंत्रित करने का बेहतर तरीका केवल एक उपाय पर निर्भर रहने के बजाय कई उचित उपायों को मिलाकर अपनाना है। इसे एकीकृत कीट प्रबंधन के रूप में देखा जाता है। इसमें खेत की निगरानी, साफ-सफाई, स्वस्थ बीज और पौध सामग्री, संतुलित पोषण, खरपतवार प्रबंधन तथा जरूरत के अनुसार जैविक या रासायनिक नियंत्रण जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।
नियमित निगरानी से किसान को यह समझने में मदद मिलती है कि खेत में समस्या बढ़ रही है या नहीं। इससे अनावश्यक छिड़काव से भी बचा जा सकता है। लाभकारी कीटों और प्राकृतिक शत्रुओं को बचाना भी इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि खेत में मौजूद हर कीट नुकसानदायक नहीं होता।
रासायनिक दवा की जरूरत होने पर भी उसका चुनाव फसल, लक्षित कीट या रोग और अनुशंसित उपयोग के अनुसार होना चाहिए। केवल अधिक मात्रा में दवा डालने से बेहतर नियंत्रण की गारंटी नहीं मिलती।
शुरुआत की छोटी गलती बन सकती है बड़ी समस्या
कीट और बीमारियों का ज्यादा प्रकोप हमेशा अचानक नहीं होता। कई बार इसकी पृष्ठभूमि में खेत की सफाई की कमी, असंतुलित पोषण, पानी का गलत प्रबंधन और फसल की समय पर निगरानी न करना जैसी गलतियां होती हैं। इन कारणों को शुरुआत में ही ठीक करने पर फसल को अनावश्यक नुकसान से बचाने में मदद मिल सकती है।
किसानों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि खेत में कोई लक्षण दिखाई देते ही केवल दवा का नाम तलाशने के बजाय पहले समस्या की सही पहचान करें। स्वस्थ पौधों के लिए साफ खेत, संतुलित पोषण, उचित पानी प्रबंधन और नियमित निगरानी को खेती की रोजमर्रा की व्यवस्था का हिस्सा बनाना चाहिए। यही सावधानी कीट और बीमारियों के बढ़ते दबाव को रोकने की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदम हो सकती है।