सरसों बुवाई का सबसे बेस्ट तरीका | Sarso ki kheti 202 | Sarso ki top variety | Sarso me khad

सरसों की अच्छी फसल के लिए केवल अच्छी किस्म का बीज चुनना ही काफी नहीं है। सही समय पर बुवाई, खेत की तैयारी, उचित दूरी, संतुलित खाद और समय पर सिंचाई जैसे कई कदम मिलकर उत्पादन को बेहतर बनाते हैं। इस बार सरसों की खेती करने वाले किसानों के लिए वैज्ञानिक तरीके से बुवाई और पोषण प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

सरसों की बुवाई का सही समय क्या है

सरसों की बुवाई का समय क्षेत्र, मौसम, किस्म और उपलब्ध सिंचाई सुविधा के अनुसार बदल सकता है। सामान्य परिस्थितियों में समय पर बोई जाने वाली सरसों की बुवाई सितंबर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के मध्य तक करना उपयुक्त माना जाता है। बहुत देर से बुवाई करने पर पौधे को बढ़ने और दाना भरने के लिए पर्याप्त अनुकूल मौसम नहीं मिल पाता और फसल पर कीट तथा रोग का दबाव भी बढ़ सकता है।

उत्तर भारत में जहां धान के बाद सरसों बोई जाती है, वहां खेत खाली होते ही जमीन में उपलब्ध नमी का सही उपयोग करते हुए समय पर बुवाई करना महत्वपूर्ण है। खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए, लेकिन पानी का ठहराव नहीं होना चाहिए। सरसों जलभराव को अच्छी तरह सहन नहीं करती।

सरसों की बुवाई का सबसे अच्छा तरीका

सरसों की खेती में लाइन से बुवाई को प्राथमिकता देना बेहतर रहता है। इससे पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखना आसान होता है और बाद में निराई-गुड़ाई तथा फसल की निगरानी भी सुविधाजनक रहती है। सामान्य भारतीय सरसों के लिए परिस्थितियों के अनुसार बीज दर अलग हो सकती है, इसलिए स्थानीय कृषि सिफारिश के अनुसार बीज की मात्रा तय करना उचित है।

समय पर बोई जाने वाली फसल में लगभग 30 से 45 सेंटीमीटर की कतार दूरी और पौधों के बीच करीब 10 से 15 सेंटीमीटर की दूरी रखने की सिफारिश अलग-अलग उत्पादन परिस्थितियों में की जाती है। बहुत अधिक बीज डालने से पौधे आपस में घने हो जाते हैं, जिससे हवा का आवागमन कम हो सकता है और पोषक तत्वों तथा नमी के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।

बुवाई से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार करके भुरभुरी मिट्टी तैयार करनी चाहिए। बीज को बहुत गहराई में डालने के बजाय उचित गहराई पर बोना जरूरी है, ताकि अंकुरण एकसमान हो सके। जहां संभव हो, सीड ड्रिल या अन्य लाइन बुवाई उपकरण का इस्तेमाल किया जा सकता है।

सरसों में शुरुआती पौध संख्या सही रखना आगे की पूरी फसल के लिए महत्वपूर्ण है। बुवाई के बाद यदि कहीं पौधे बहुत अधिक घने निकल आएं तो उचित समय पर छंटाई करके पौधों के बीच आवश्यक दूरी बनाए रखना चाहिए।

सरसों की टॉप किस्म कौन सी है

सरसों की कोई एक किस्म हर क्षेत्र और हर किसान के लिए सबसे अच्छी नहीं कही जा सकती। किस्म का चुनाव क्षेत्र, बुवाई का समय, सिंचाई की सुविधा और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए।

समय पर बोई जाने वाली फसल के लिए उत्तर प्रदेश सहित उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में गिरिराज जैसी किस्मों का उपयोग किया जाता रहा है। इसके अलावा अलग-अलग क्षेत्रों में पूसा बोल्ड, वरुणा और अन्य अनुशंसित किस्में भी खेती में उपयोग की जाती हैं।

नई किस्मों और हाइब्रिड पर भी लगातार काम हो रहा है। NRCHB-506 को समय पर बोई जाने वाली परिस्थितियों में राजस्थान और उत्तर प्रदेश के लिए अनुशंसित भारतीय सरसों हाइब्रिड के रूप में बताया गया है। इसे सामान्य किस्म समझने के बजाय हाइब्रिड के रूप में समझना चाहिए और इसके बीज का चुनाव प्रमाणित तथा विश्वसनीय स्रोत से करना चाहिए।

किसान के लिए सही विकल्प वही होगा जो उसके जिले और बुवाई की परिस्थिति के लिए अनुशंसित हो। केवल अधिक उत्पादन के दावे के आधार पर किसी किस्म का चुनाव करना उचित नहीं है।

सरसों में कौन सी खाद डालें

सरसों में खाद की मात्रा मिट्टी की उर्वरता और मृदा परीक्षण के आधार पर तय करना सबसे बेहतर तरीका है। एक ही मात्रा हर खेत के लिए सही नहीं होती। जरूरत से अधिक नाइट्रोजन डालने से लागत बढ़ने के साथ पौधे की अनावश्यक बढ़वार हो सकती है, जबकि पोषक तत्वों की कमी से उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

सरसों की फसल में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के साथ सल्फर का भी विशेष महत्व है। वैज्ञानिक सिफारिशों में समय पर बोई गई सरसों के लिए संतुलित NPK प्रबंधन के साथ सल्फर देने पर जोर दिया गया है। सल्फर की जरूरत पूरी करने के लिए ऐसी उर्वरक सामग्री का चयन किया जा सकता है जिसमें सल्फर उपलब्ध हो।

खाद डालते समय पूरी मात्रा केवल यूरिया के रूप में देने से बचना चाहिए। नाइट्रोजन की आवश्यकता होने पर उसका एक हिस्सा बुवाई के समय और शेष हिस्सा फसल की अवस्था तथा सिंचाई की उपलब्धता के अनुसार दिया जा सकता है। खेत की वास्तविक जरूरत जानने के लिए मृदा परीक्षण सबसे भरोसेमंद आधार है।

सरसों में खाद प्रबंधन के दौरान इन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए:

  • खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरक की मात्रा तय करें।
  • फास्फोरस और पोटाश की जरूरत को नजरअंदाज न करें।
  • सल्फर की कमी वाले खेत में उपयुक्त सल्फर युक्त उर्वरक का इस्तेमाल करें।
  • नाइट्रोजन की पूरी मात्रा एक साथ देने के बजाय फसल की जरूरत और स्थानीय सिफारिश के अनुसार दें।

पहली सिंचाई कब करें

सरसों की फसल में सिंचाई की जरूरत मिट्टी, मौसम और वर्षा पर निर्भर करती है। सामान्य तौर पर फूल आने से पहले की अवस्था महत्वपूर्ण मानी जाती है। पर्याप्त सिंचाई सुविधा वाले खेतों में बुवाई के बाद फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं पर जरूरत के अनुसार सिंचाई करने से उत्पादन में लाभ मिल सकता है।

वैज्ञानिक उत्पादन तकनीक में सरसों के लिए फूल आने से पहले और फलियों के विकास के समय पानी की उपलब्धता को महत्वपूर्ण माना गया है। हालांकि भारी मिट्टी, हल्की मिट्टी और वर्षा आधारित खेतों में सिंचाई का कार्यक्रम अलग हो सकता है।

सिंचाई करते समय खेत में पानी खड़ा नहीं होना चाहिए। अधिक पानी से जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और कुछ रोगों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए मिट्टी की नमी देखकर ही सिंचाई करना बेहतर है।

सरसों में खरपतवार और पौधों की दूरी का रखें ध्यान

सरसों की शुरुआती अवस्था में खरपतवार फसल के साथ पानी, प्रकाश और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं। इसलिए शुरुआती दिनों में खेत को खरपतवार से मुक्त रखना जरूरी है। लाइन से बुवाई होने पर निराई-गुड़ाई करना भी आसान हो जाता है।

बुवाई के लगभग 15 से 25 दिन बाद जरूरत के अनुसार अतिरिक्त पौधों की छंटाई की जा सकती है। इससे खेत में पौधों की संख्या संतुलित रहती है। खरपतवार नियंत्रण के लिए यांत्रिक निराई-गुड़ाई को प्राथमिकता दी जा सकती है और रसायन का इस्तेमाल स्थानीय अनुशंसा तथा फसल की अवस्था के अनुसार ही करना चाहिए।

सरसों में एफिड यानी माहू जैसे कीट और अल्टरनेरिया झुलसा तथा सफेद रतुआ जैसे रोग भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसलिए खेत की नियमित निगरानी जरूरी है। बिना कीट या रोग की पहचान किए किसी भी कीटनाशक या रोगनाशक का अनावश्यक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

अच्छी पैदावार के लिए किन बातों का रखें ध्यान

सरसों की खेती में उत्पादन केवल बीज की किस्म पर निर्भर नहीं करता। समय पर बुवाई, सही पौध संख्या और संतुलित पोषण जैसे सभी प्रबंधन एक साथ बेहतर परिणाम देते हैं। किसान को अपने क्षेत्र की स्थानीय कृषि सलाह के अनुसार खेती की तकनीक में बदलाव करना चाहिए।

खास तौर पर धान के बाद सरसों बोने वाले किसानों के लिए समय पर खेत तैयार करना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि खेत खाली होने में देरी होती है तो सरसों की बुवाई भी पीछे खिसक सकती है। इसलिए पिछली फसल की कटाई और अगली फसल की बुवाई के बीच उपलब्ध समय का सही इस्तेमाल करना जरूरी है।

फसल पकने पर भी सावधानी रखनी चाहिए। सरसों की फलियां पूरी तरह सूखने के बाद देर से कटाई करने पर दाने झड़ने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए फसल की परिपक्वता देखकर उचित समय पर कटाई करना चाहिए।

निष्कर्ष

सरसों की सफल खेती के लिए सबसे जरूरी बात है कि किसान केवल किसी एक खाद या किसी एक टॉप किस्म पर निर्भर न रहे। सही समय पर बुवाई, अच्छी गुणवत्ता वाला क्षेत्र के अनुकूल बीज, उचित पौध दूरी, मृदा परीक्षण आधारित खाद प्रबंधन, संतुलित सिंचाई और समय पर खरपतवार व कीट रोग नियंत्रण मिलकर फसल की क्षमता को बेहतर बनाते हैं।

समय पर बोई जाने वाली सरसों में गिरिराज और NRCHB-506 जैसी अनुशंसित सामग्री कुछ क्षेत्रों के लिए उपयोगी विकल्प हो सकती है, लेकिन अंतिम चुनाव स्थानीय सिफारिश के अनुसार ही करना चाहिए। इसी तरह खाद की मात्रा भी खेत की मिट्टी और फसल की जरूरत के आधार पर तय करना अधिक सुरक्षित और लाभकारी तरीका है। यदि किसान शुरुआत से इन बातों का ध्यान रखता है, तो सरसों की फसल में बेहतर पौध विकास और उत्पादन की संभावना बढ़ाई जा सकती है।

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