धान में तीसरी बार कब और कितनी यूरिया दें। कोन सी गलती न करें।

धान की फसल में यूरिया की तीसरी खुराक को लेकर किसानों के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि इसे किस अवस्था में देना सही रहेगा और कितनी मात्रा में देने से फसल को फायदा मिलेगा। तीसरी बार यूरिया का समय केवल दिन गिनकर तय करना सही नहीं है, बल्कि धान की किस्म, फसल की अवस्था और पहले दी गई नाइट्रोजन की मात्रा को ध्यान में रखना जरूरी है।

विशेषज्ञ सलाह में धान में नाइट्रोजन को एक साथ देने के बजाय अलग-अलग खुराक में देने पर जोर दिया जाता है। इससे फसल को जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन मिलती है और बेवजह यूरिया डालने से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है।

तीसरी बार यूरिया कब देनी चाहिए

धान में तीसरी बार यूरिया देने का सही समय खेत और किस्म के अनुसार बदल सकता है। सामान्य रूप से तीसरी खुराक को बालियां बनने की शुरुआती अवस्था यानी पैनिकल इनिशिएशन के आसपास रखा जाता है। कुछ अनुशंसाओं में नाइट्रोजन की अंतिम खुराक पैनिकल इनिशिएशन से लगभग 5 से 7 दिन पहले देने की सलाह दी गई है।

इसलिए केवल यह देखकर यूरिया नहीं डालनी चाहिए कि पिछली खुराक दिए कई दिन हो गए हैं। खेत में पौधों की स्थिति और फसल की अवस्था देखना अधिक महत्वपूर्ण है। यदि धान अभी केवल तेज कल्ले बनाने की अवस्था में है, तो तीसरी खुराक का समय अलग हो सकता है। वहीं बालियां बनने की प्रक्रिया शुरू होने के करीब फसल पहुंच चुकी है तो नाइट्रोजन की जरूरत को ध्यान में रखकर अंतिम टॉप ड्रेसिंग की योजना बनाई जा सकती है।

सीधे बोए गए धान और रोपाई वाले धान में भी खाद देने का कार्यक्रम एक जैसा नहीं माना जा सकता। अलग-अलग किस्मों और क्षेत्रों के लिए अनुशंसित नाइट्रोजन की कुल मात्रा भी अलग हो सकती है।

कितनी यूरिया डालें, इसका एक तय जवाब क्यों नहीं है

तीसरी बार यूरिया की मात्रा सभी खेतों के लिए एक जैसी तय करना उचित नहीं है। यूरिया की जरूरत खेत की मिट्टी, धान की किस्म, पहले दी गई नाइट्रोजन, फसल की बढ़वार और स्थानीय कृषि अनुशंसा पर निर्भर करती है।

किसान को सबसे पहले यह हिसाब देखना चाहिए कि अब तक खेत में यूरिया या दूसरे नाइट्रोजन स्रोतों से कितनी नाइट्रोजन दी जा चुकी है। इसके बाद ही बची हुई अनुशंसित मात्रा में से तीसरी खुराक तय करनी चाहिए। मृदा परीक्षण आधारित उर्वरक प्रबंधन इस मामले में अधिक सटीक तरीका है।

भाकृअनुप की कृषि सलाह में भी धान में नाइट्रोजन को विभाजित खुराकों में देने पर जोर दिया गया है। कुछ अनुशंसित उत्पादन प्रणालियों में नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा को रोपाई के बाद अलग-अलग समय पर देने की व्यवस्था बताई गई है। इसलिए हर खेत में केवल एक निश्चित बोरी या किलो यूरिया डालने का नियम बनाना सही नहीं होगा।

तीसरी खुराक देने से पहले इन बातों पर ध्यान दें

तीसरी बार यूरिया देने से पहले खेत की स्थिति देखना जरूरी है। बहुत ज्यादा हरी और नरम बढ़वार वाली फसल में बिना जरूरत अतिरिक्त नाइट्रोजन देना नुकसानदायक हो सकता है। दूसरी ओर, यदि फसल में नाइट्रोजन की कमी स्पष्ट है तो उचित अनुशंसा के अनुसार खुराक देना जरूरी हो सकता है।

खरपतवार की स्थिति भी ध्यान में रखनी चाहिए। खेत में खरपतवार बहुत ज्यादा हैं तो डाली गई नाइट्रोजन का एक हिस्सा फसल के बजाय खरपतवारों द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए खाद प्रबंधन को खरपतवार नियंत्रण के साथ जोड़कर देखना चाहिए।

धान में पानी का प्रबंधन भी यूरिया की दक्षता से जुड़ा हुआ है। बहुत अधिक पानी या खेत से पानी का बहाव होने की स्थिति में पोषक तत्वों का नुकसान बढ़ सकता है। खाद डालते समय खेत में ऐसी स्थिति नहीं होनी चाहिए जिसमें यूरिया बहकर बाहर चली जाए।

यूरिया डालते समय कौन सी गलती न करें

सबसे आम गलती जरूरत से ज्यादा यूरिया डालना है। अधिक यूरिया डालने से यह जरूरी नहीं कि धान की पैदावार उसी अनुपात में बढ़ जाए। अत्यधिक नाइट्रोजन से पौधों में बहुत ज्यादा नरम और हरी बढ़वार हो सकती है तथा फसल की मजबूती और अन्य पोषक तत्वों के संतुलन पर भी असर पड़ सकता है।

दूसरी गलती यह है कि किसान पिछली खुराक की मात्रा जाने बिना फिर से यूरिया डाल देते हैं। खेत में पहले कितनी नाइट्रोजन दी गई है, इसका हिसाब रखना बहुत जरूरी है।

तीसरी गलती केवल कैलेंडर के आधार पर खाद देना है। धान की अलग-अलग किस्मों और अलग-अलग रोपाई या बुवाई समय के कारण फसल की अवस्था एक जैसी नहीं होती। इसलिए तीसरी खुराक का निर्णय फसल की अवस्था देखकर करना बेहतर है।

चौथी गलती संतुलित उर्वरीकरण को नजरअंदाज करना है। केवल यूरिया पर निर्भर रहने के बजाय मिट्टी की जरूरत और अनुशंसित पोषक तत्वों के अनुसार खाद प्रबंधन करना चाहिए।

  • पहले दी गई यूरिया और अन्य नाइट्रोजन स्रोतों की मात्रा का हिसाब रखें।
  • तीसरी खुराक फसल की अवस्था और स्थानीय अनुशंसा के अनुसार तय करें।
  • जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने से बचें।
  • खेत में पानी के बहाव और पोषक तत्वों के नुकसान की स्थिति न बनने दें।

तीसरी यूरिया के बाद फसल में क्या देखें

तीसरी खुराक देने के बाद किसान को खेत की बढ़वार पर नजर रखनी चाहिए। केवल पत्तियों का ज्यादा हरा होना ही अच्छी फसल का प्रमाण नहीं है। धान की वास्तविक स्थिति समझने के लिए पौधों की मजबूती, कल्लों की स्थिति और आगे बनने वाली बालियों के विकास को भी देखना चाहिए।

यदि खेत में पहले से नाइट्रोजन पर्याप्त है तो केवल फसल को और ज्यादा हरा करने के लिए अतिरिक्त यूरिया देना उचित नहीं माना जाना चाहिए। दूसरी ओर, कमी के लक्षण दिखाई देने पर किसान को स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और खेत की स्थिति के आधार पर पोषण प्रबंधन करना चाहिए।

मृदा परीक्षण भी भविष्य के लिए उपयोगी आधार देता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि खेत में किन पोषक तत्वों की जरूरत है और कहां अनावश्यक खाद देने से बचा जा सकता है।

सही समय और संतुलित मात्रा ही सबसे जरूरी

धान में तीसरी बार यूरिया देने का सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि इसे केवल तय तारीख या सभी किसानों के लिए एक जैसी मात्रा के आधार पर न किया जाए। पैनिकल इनिशिएशन के आसपास फसल की अवस्था, किस्म, पहले दी गई नाइट्रोजन और खेत की उर्वरता को देखकर अंतिम नाइट्रोजन खुराक की योजना बनानी चाहिए।

किसान अगर जरूरत से ज्यादा यूरिया डालने के बजाय विभाजित और संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाते हैं, तो नाइट्रोजन का उपयोग अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सकता है। इसलिए तीसरी यूरिया में जल्दबाजी से ज्यादा जरूरी है सही अवस्था पहचानना, पहले दी गई खाद का हिसाब रखना और अपने क्षेत्र की अनुशंसित मात्रा का पालन करना।

धान की अच्छी फसल के लिए केवल यूरिया बढ़ाना समाधान नहीं है। सही समय पर सही मात्रा में पोषक तत्व देना, पानी और खरपतवार का उचित प्रबंधन करना तथा मिट्टी की जरूरत के अनुसार खाद देना ही बेहतर पोषण प्रबंधन की बुनियाद है।

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