वाटर सॉल्युबल फर्टिलाइजर यानी पानी में पूरी तरह घुलने वाली खाद का इस्तेमाल फसल को उसकी जरूरत के अनुसार पोषक तत्व देने के लिए किया जाता है। खासकर ड्रिप और फर्टिगेशन व्यवस्था में इन खादों का उपयोग बढ़ा है, क्योंकि पोषक तत्व पानी के साथ सीधे जड़ क्षेत्र तक पहुंचाए जा सकते हैं।
लेकिन NPK का कोई एक ऐसा कोर्स नहीं है जो हर फसल और हर खेत में समान मात्रा में लागू किया जा सके। फसल की उम्र, मिट्टी की जांच, सिंचाई व्यवस्था, मौसम और पोषक तत्वों की जरूरत के अनुसार खाद का ग्रेड और मात्रा बदलती है। इसलिए सही तरीका यह है कि NPK को फसल की अवस्था के हिसाब से समझकर इस्तेमाल किया जाए।
वाटर सॉल्युबल NPK क्या होता है और इसमें कौन-कौन सी खाद आती हैं
वाटर सॉल्युबल फर्टिलाइजर ऐसी खाद होती है जो पानी में घुलकर पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराती है। इनमें नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश अलग-अलग अनुपात में हो सकते हैं। उदाहरण के लिए 19:19:19 में तीनों प्रमुख पोषक तत्व संतुलित मात्रा में होते हैं, जबकि 13:0:45 में नाइट्रोजन और पोटाश की मात्रा अधिक होती है तथा फॉस्फोरस नहीं होता।
किसान अक्सर 19:19:19, 12:61:0, 0:52:34, 13:0:45 और 0:0:50 जैसे ग्रेड का उपयोग फसल की अलग-अलग अवस्थाओं में करते हैं। इनका चयन केवल नाम देखकर नहीं बल्कि फसल की वास्तविक पोषण जरूरत के आधार पर करना चाहिए।
शुरुआती बढ़वार में पौधे को पर्याप्त नाइट्रोजन की जरूरत होती है, जबकि जड़ विकास और फूल बनने की अवस्था में फॉस्फोरस की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। फल, दाना या गन्ने जैसी उपज के विकास के दौरान पोटाश की जरूरत बढ़ सकती है। इसी कारण पूरे फसल चक्र में एक ही NPK ग्रेड लगातार डालना हमेशा उचित नहीं होता।
फसल की अवस्था के अनुसार NPK का चुनाव कैसे करें
वाटर सॉल्युबल खाद का सबसे महत्वपूर्ण नियम है कि खाद का ग्रेड फसल की अवस्था के अनुसार बदला जाए। शुरुआती अवस्था में संतुलित NPK का इस्तेमाल कई फसलों में किया जाता है, जबकि फूल आने या फल बनने की अवस्था में फॉस्फोरस और पोटाश की जरूरत के अनुसार अलग ग्रेड चुने जा सकते हैं।
19:19:19 जैसे संतुलित NPK ग्रेड का उपयोग कई सब्जियों और अन्य फसलों में बढ़वार के दौरान किया जाता है। 12:61:0 जैसे उच्च फॉस्फोरस वाले ग्रेड का इस्तेमाल उन परिस्थितियों में किया जाता है जहां फसल को फॉस्फोरस की अधिक आवश्यकता हो। 13:0:45 जैसे पोटाश प्रधान ग्रेड का उपयोग फसल की बाद की अवस्थाओं में किया जा सकता है, लेकिन इसकी मात्रा फसल और पहले से दिए गए पोषक तत्वों पर निर्भर करती है।
फर्टिगेशन में खाद को एक साथ बहुत अधिक मात्रा में देने के बजाय फसल की जरूरत के अनुसार कई हिस्सों में देना अधिक नियंत्रित तरीका है। इससे जड़ क्षेत्र में पोषक तत्वों की उपलब्धता को फसल की बढ़वार के साथ मिलाया जा सकता है।
धान, गेहूं और मक्का में वाटर सॉल्युबल NPK का उपयोग
धान और गेहूं जैसी अनाज वाली फसलों में केवल पानी में घुलने वाली NPK खाद पर पूरा पोषण कार्यक्रम तय करना सही नहीं है। इन फसलों में कुल नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश की जरूरत पहले तय की जाती है और फिर मिट्टी, सिंचाई तथा खेती की पद्धति के अनुसार खादों का विभाजन किया जाता है।
गेहूं में सामान्य रूप से बुवाई के समय फॉस्फोरस और पोटाश के साथ नाइट्रोजन का एक हिस्सा दिया जाता है। बाकी नाइट्रोजन को सिंचाई के आसपास विभाजित करके देने की व्यवस्था कई अनुशंसित उत्पादन प्रणालियों में अपनाई जाती है। इसलिए केवल 19:19:19 को बार-बार डालना गेहूं के लिए पूर्ण खाद प्रबंधन नहीं माना जा सकता।
मक्का में फर्टिगेशन की सुविधा होने पर पोषक तत्वों को फसल की शुरुआती बढ़वार, तेज vegetative growth और बाद की अवस्था के अनुसार विभाजित किया जा सकता है। मक्का की फर्टिगेशन तकनीक में 19:19:19, फॉस्फोरस प्रधान खाद और पोटाश प्रधान खाद जैसे अलग-अलग स्रोतों का उपयोग जरूरत के अनुसार किया जाता है।
धान में भी खेत की स्थिति और सिंचाई पद्धति के अनुसार पोषण प्रबंधन बदलता है। लगातार पानी भरे रहने वाली स्थिति में खाद देने का तरीका सूखी या नियंत्रित सिंचाई वाली व्यवस्था से अलग हो सकता है। इसलिए धान के लिए भी किसी एक वाटर सॉल्युबल NPK को पूरे मौसम का सार्वभौमिक कोर्स मानना उचित नहीं है।
सब्जियों और फल वाली फसलों में NPK का पूरा कोर्स
टमाटर, शिमला मिर्च, खीरा, मिर्च जैसी सब्जियों में वाटर सॉल्युबल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल विशेष रूप से ड्रिप फर्टिगेशन के साथ किया जाता है। इन फसलों में पौधे की शुरुआती बढ़वार, फूल आने और फल बनने के दौरान पोषक तत्वों की जरूरत बदलती रहती है।
टमाटर में फर्टिगेशन के दौरान NPK का अनुपात फसल की बढ़वार और मौसम के अनुसार बदला जा सकता है। कुछ उत्पादन प्रणालियों में शुरुआती और बाद की अवस्था के लिए अलग पोषण अनुपात अपनाया जाता है। इसलिए फल लगने के बाद केवल नाइट्रोजन बढ़ाते रहना सही रणनीति नहीं है, क्योंकि इससे पौधे की अनावश्यक vegetative growth बढ़ सकती है।
शिमला मिर्च जैसी फसलों में 19:19:19 जैसे संतुलित वाटर सॉल्युबल फर्टिलाइजर का उपयोग पौध रोपाई के बाद की अवस्था में किया जाता है और फसल की अवस्था के अनुसार फर्टिगेशन जारी रखा जाता है। खीरे में भी मिट्टी की पोषण स्थिति के आधार पर बेसल खाद के साथ पानी में घुलने वाली खादों का उपयोग किया जाता है।
सब्जियों में खाद का कार्यक्रम बनाते समय केवल NPK ही नहीं बल्कि कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर और सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत भी ध्यान में रखनी चाहिए। यदि मिट्टी या पौधे में किसी सूक्ष्म तत्व की कमी है तो केवल NPK बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा।
फूल, फल और दाना बनने की अवस्था में कौन सा NPK बेहतर है
फसल के फूल और फल बनने की अवस्था में पोषक तत्वों का संतुलन बदल जाता है। इस समय पौधे की जरूरत के अनुसार फॉस्फोरस और पोटाश की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। 0:52:34 जैसे मोनो पोटेशियम फॉस्फेट और 13:0:45 जैसे पोटाश प्रधान ग्रेड इसी तरह की पोषण आवश्यकताओं के लिए उपयोग किए जाने वाले पानी में घुलनशील स्रोत हैं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर फसल में फूल आते ही एक निश्चित मात्रा में 0:52:34 या 13:0:45 डालना चाहिए। फसल की प्रजाति, मिट्टी की जांच, पहले दी गई खाद और फसल की स्थिति के आधार पर मात्रा और समय बदलता है।
फलों और सब्जियों में फल बनने तथा आकार बढ़ने के दौरान पोटाश की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। वहीं दाना वाली फसलों में भी अंतिम उपज निर्माण के दौरान संतुलित पोषण जरूरी होता है। अधिक खाद देने से उत्पादन हमेशा उसी अनुपात में नहीं बढ़ता और कुछ परिस्थितियों में पोषक तत्वों का असंतुलन भी पैदा हो सकता है।
इसलिए फूल आने के बाद खाद का ग्रेड बदलने से पहले यह देखना जरूरी है कि फसल को वास्तव में किस पोषक तत्व की जरूरत है। पत्तियों का रंग, पौधे की बढ़वार और फसल की अवस्था देखकर अनुमान लगाने के बजाय संभव हो तो मिट्टी और पौध पोषण की जांच को आधार बनाना अधिक सुरक्षित तरीका है।
वाटर सॉल्युबल NPK डालते समय इन बातों का रखें ध्यान
वाटर सॉल्युबल फर्टिलाइजर महंगी खाद हो सकती है, इसलिए इसका इस्तेमाल फसल की जरूरत के अनुसार करना जरूरी है। खासकर ड्रिप फर्टिगेशन में खाद की मात्रा, पानी की मात्रा और घुलनशीलता पर ध्यान देना चाहिए।
- खाद की मात्रा फसल और मिट्टी की अनुशंसित पोषक तत्व जरूरत के आधार पर तय करें।
- फर्टिगेशन में पूरी तरह घुलने वाली और सिंचाई व्यवस्था के अनुकूल खाद का ही इस्तेमाल करें।
- अलग-अलग खादों को टैंक में मिलाने से पहले उनकी आपसी संगतता और घुलनशीलता की जांच करें।
- फर्टिगेशन के बाद पर्याप्त साफ पानी चलाकर ड्रिप लाइन में बची खाद को आगे निकालना जरूरी है।
कुछ फॉस्फोरस और कैल्शियम वाली खादों को बिना संगतता जांच के एक ही टैंक में मिलाने पर अवक्षेप बन सकता है। इससे ड्रिप लाइन और फिल्टर में रुकावट की समस्या हो सकती है। इसलिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि दोनों खाद पानी में घुलती हैं; यह भी देखना जरूरी है कि साथ मिलाने पर वे आपस में प्रतिक्रिया तो नहीं करतीं।
NPK का सही कोर्स बनाने का सबसे आसान तरीका
किसान के लिए सबसे व्यावहारिक तरीका यह है कि पूरे फसल चक्र को तीन या चार पोषण अवस्थाओं में समझा जाए। पहले मिट्टी की जांच और फसल की अनुशंसित कुल NPK जरूरत तय की जाए। इसके बाद बुवाई या रोपाई के समय दी जाने वाली खाद और फर्टिगेशन से दी जाने वाली खाद को अलग-अलग समझा जाए।
शुरुआती बढ़वार में संतुलित पोषण पर ध्यान दिया जाता है। इसके बाद फसल की बढ़वार तेज होने पर नाइट्रोजन की जरूरत के अनुसार कार्यक्रम बनाया जाता है। फूल और फल या दाना बनने की अवस्था में फॉस्फोरस और पोटाश का अनुपात फसल की जरूरत के अनुसार बदला जा सकता है। अंतिम अवस्था में अनावश्यक नाइट्रोजन देने से बचना चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि वाटर सॉल्युबल NPK को खेत में पहले से दी गई खाद का विकल्प मानकर अतिरिक्त मात्रा में न डालें। यदि बेसल खाद से पहले ही पर्याप्त फॉस्फोरस या पोटाश मिल चुका है तो फर्टिगेशन के जरिए वही पोषक तत्व दोबारा अधिक मात्रा में देने की जरूरत नहीं हो सकती।
निष्कर्ष
वाटर सॉल्युबल NPK फसल को पोषक तत्व देने का प्रभावी माध्यम है, लेकिन इसका सही फायदा तभी मिलता है जब खाद का ग्रेड, मात्रा और समय फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार तय किया जाए। 19:19:19, 12:61:0, 0:52:34, 13:0:45 और 0:0:50 जैसे अलग-अलग ग्रेड की अपनी भूमिका है और इन्हें एक ही तरीके से हर फसल में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, टमाटर, मिर्च, शिमला मिर्च और खीरे जैसी फसलों में पोषण कार्यक्रम अलग होता है। खासकर ड्रिप फर्टिगेशन वाली खेती में खाद को छोटी-छोटी मात्रा में फसल की अवस्था के अनुसार देना अधिक नियंत्रित तरीका हो सकता है।
इसलिए वाटर सॉल्युबल फर्टिलाइजर का सबसे सही कोर्स वही है जो मिट्टी की जांच, फसल की अनुशंसित NPK जरूरत, सिंचाई व्यवस्था और फसल की वर्तमान अवस्था को ध्यान में रखकर बनाया जाए। केवल खाद का ग्रेड देखकर अधिक मात्रा में डालना सही खेती नहीं है; संतुलित और जरूरत के अनुसार पोषण ही बेहतर परिणाम की आधारशिला है।