गन्ने की CO 0238 किस्म ने उत्तर भारत में गन्ने की खेती और चीनी उत्पादन, दोनों को नई दिशा दी है। इस किस्म को डॉ. बक्शी राम और उनकी टीम ने विकसित किया था और इसे 2009 में उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में व्यावसायिक खेती के लिए जारी किया गया था।
CO 0238 को Karan 4 के नाम से भी जाना जाता है। यह जल्दी पकने वाली, अधिक उपज और बेहतर चीनी गुणवत्ता वाली किस्म है, लेकिन इसका अच्छा प्रदर्शन तभी मिलता है जब बीज, खेत की तैयारी, पोषण, पानी और कीट प्रबंधन पर बराबर ध्यान दिया जाए। आइए जानते हैं इस किस्म की खेती से जुड़े 20 से ज्यादा महत्वपूर्ण विशेषज्ञ सुझाव।
CO 0238 को खास क्यों माना जाता है
CO 0238 को CoLk 8102 और Co 775 के क्रॉस से विकसित किया गया। इसे ICAR गन्ना प्रजनन संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र, करनाल में विकसित किया गया था। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में किए गए परीक्षणों में इस किस्म ने गन्ने की उपज के मामले में अच्छा प्रदर्शन किया और इसे जल्दी पकने वाली किस्म के रूप में पहचान मिली।
इसकी खासियत केवल अधिक गन्ना उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसमें रस की गुणवत्ता और चीनी की रिकवरी भी अच्छी पाई गई है। परीक्षणों में इसकी औसत गन्ना उपज लगभग 81 टन प्रति हेक्टेयर रही थी। हालांकि खेत में वास्तविक उत्पादन मिट्टी, मौसम, सिंचाई, खाद, बीज की गुणवत्ता और फसल प्रबंधन के अनुसार काफी बदल सकता है।
इस किस्म का एक और महत्वपूर्ण गुण यह है कि यह उपोष्णकटिबंधीय परिस्थितियों में दूसरी रैटून फसल तक लेने के लिए उपयुक्त पाई गई है। सर्दियों में कटाई के बाद भी इसके ठूंठों से अच्छी फुटाव क्षमता देखी गई है।
बक्शी राम की सलाह में सबसे पहले बीज की गुणवत्ता
गन्ने की अच्छी फसल की शुरुआत स्वस्थ बीज से होती है। CO 0238 में भी कमजोर, रोगग्रस्त या कीट से प्रभावित गन्ने को बीज के रूप में इस्तेमाल करने से बचना जरूरी है। बक्शी राम ने किसानों को स्वस्थ बीज और संतुलित प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी है।
बीज के लिए ऐसे खेत और पौधों का चयन करना चाहिए जिनमें फसल का विकास अच्छा हो और बीमारी या कीट का स्पष्ट प्रकोप न दिखाई दे। खास तौर पर चोटी बेधक से प्रभावित पौधों को बीज के लिए नहीं रखना चाहिए।
मिट्टी की जांच भी खेती की योजना का अहम हिस्सा है। केवल अनुमान के आधार पर बार-बार खाद डालने के बजाय मिट्टी में उपलब्ध पोषक तत्वों के आधार पर पोषण प्रबंधन करना ज्यादा उचित माना जाता है।
CO 0238 की खेती में ध्यान रखने वाली 22 जरूरी बातें
CO 0238 को अधिक उपज देने वाली किस्म माना जाता है, लेकिन इसकी क्षमता का पूरा लाभ लेने के लिए खेत में कई बातों का एक साथ ध्यान रखना पड़ता है। केवल अच्छी किस्म का बीज लगाने से ही अधिक उत्पादन की गारंटी नहीं होती।
- हमेशा स्वस्थ और प्रमाणित स्रोत से प्राप्त बीज गन्ने को प्राथमिकता दें।
- चोटी बेधक से प्रभावित पौधों को बीज के रूप में इस्तेमाल न करें।
- खेत की मिट्टी की जांच कराकर खाद और पोषक तत्वों की जरूरत तय करें।
- जरूरत से ज्यादा रासायनिक खाद डालने से बचें और संतुलित पोषण रखें।
- खेत में पानी के निकास की व्यवस्था रखें, क्योंकि लंबे समय तक जलभराव फसल के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
- गर्मी और सूखे की स्थिति में फसल की पानी की जरूरत पर लगातार नजर रखें।
- पौधों की शुरुआती बढ़वार के समय खेत को खरपतवार से मुक्त रखें।
- पर्याप्त दूरी और उचित रोपण व्यवस्था से पौधों को फैलने की जगह दें।
- ट्रेंच या उपयुक्त रोपण विधि का इस्तेमाल स्थानीय परिस्थितियों और कृषि सलाह के अनुसार किया जा सकता है।
- बीज की गुणवत्ता के साथ उसकी उचित मात्रा और सही रोपण भी जरूरी है।
- फसल में नियमित रूप से कीटों के शुरुआती लक्षणों की निगरानी करें।
- चोटी बेधक का प्रकोप दिखने पर प्रभावित पौधों को खेत में छोड़ने के बजाय निकालकर नष्ट करें।
- CO 0238 की टॉप बोरर के प्रति संवेदनशीलता को देखते हुए निगरानी में लापरवाही न करें।
- किसी भी कीटनाशक का इस्तेमाल केवल स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह और स्वीकृत उपयोग के अनुसार करें।
- फसल में रोग के लक्षण दिखने पर तुरंत पहचान कर उचित प्रबंधन करें।
- CO 0238 में गर्मी के दौरान पत्तियों के ऊपरी हिस्से के सूखने को देखकर तुरंत पूरी फसल को खराब मानने की जरूरत नहीं है; इस किस्म में ऐसी स्थिति देखी जा सकती है।
- पौधों की बढ़वार के दौरान खेत का नियमित निरीक्षण करें ताकि समस्या शुरुआती अवस्था में पकड़ में आ सके।
- कटाई के समय गन्ने को अनावश्यक रूप से खेत में ज्यादा देर तक न छोड़ें, खासकर जब पेराई का उचित समय उपलब्ध हो।
- रैटून लेने वाले खेत में कटाई के बाद ठूंठ और खेत की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दें।
- पहली फसल के अच्छे प्रदर्शन के आधार पर ही अगली रैटून फसल की योजना बनाएं और खेत की स्थिति का आकलन करें।
- एक ही किस्म पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय क्षेत्र की सलाह के अनुसार उपयुक्त अन्य किस्मों को भी शामिल करने पर विचार करें।
- उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल अधिक खाद या पानी पर निर्भर न रहें; बीज, पोषण, सिंचाई, कीट और रोग प्रबंधन को एक साथ देखें।
CO 0238 में रोपण और खेत प्रबंधन का महत्व
CO 0238 के साथ ट्रेंच प्लांटिंग जैसी व्यवस्थाओं से कुछ किसानों ने बेहतर फुटाव और अधिक उत्पादन हासिल किया है। इस विधि में गन्ने की कतारों के बीच अपेक्षाकृत अधिक जगह रखी जाती है और बीज गन्ने को बनाई गई नालियों में लगाया जाता है। हालांकि खेत की मिट्टी, सिंचाई व्यवस्था और स्थानीय कृषि परिस्थितियों के अनुसार रोपण पद्धति का चुनाव किया जाना चाहिए।
रोपण से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार करना जरूरी है। मिट्टी भुरभुरी और समतल हो तथा खेत में पानी के निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए। गन्ने की शुरुआती अवस्था में खरपतवार फसल के साथ पोषक तत्व, पानी और जगह के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, इसलिए समय पर नियंत्रण जरूरी है।
बीज गन्ने की गुणवत्ता भी यहां निर्णायक भूमिका निभाती है। कमजोर या रोगग्रस्त बीज से पौधों की संख्या और शुरुआती बढ़वार प्रभावित हो सकती है। इसलिए खेत की शुरुआत ही स्वस्थ रोपण सामग्री से करना बेहतर रहता है।
पानी और खाद में संतुलन रखना जरूरी
CO 0238 अधिक उत्पादन क्षमता वाली किस्म है, इसलिए किसान अक्सर अधिक खाद और अधिक सिंचाई को ज्यादा उत्पादन से जोड़ देते हैं। लेकिन फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार प्रबंधन करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
मिट्टी की जांच के आधार पर पोषक तत्वों की कमी को पूरा करना चाहिए। ICAR की गन्ना अनुसंधान संबंधी सिफारिशों में भी मिट्टी परीक्षण आधारित पोषण प्रबंधन पर जोर दिया गया है। नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा खेत की स्थिति के अनुसार तय की जानी चाहिए।
पानी के मामले में भी संतुलन जरूरी है। सूखे की स्थिति में फसल को पर्याप्त नमी मिलनी चाहिए, लेकिन खेत में लंबे समय तक पानी जमा रहने देना उचित नहीं है। जलभराव वाली जमीन में जड़ों की स्थिति और पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है।
CO 0238 में टॉप बोरर पर विशेष नजर
CO 0238 की खेती में सबसे महत्वपूर्ण सावधानियों में टॉप बोरर की निगरानी शामिल है। हाल के कृषि अनुसंधान में भी CO 0238 को टॉप बोरर के प्रति संवेदनशील किस्म के रूप में उल्लेख किया गया है। इसलिए केवल किस्म की अच्छी उपज क्षमता देखकर कीट प्रबंधन को नजरअंदाज करना सही नहीं होगा।
खेत में नई पत्तियों के बीच असामान्य लक्षण, सूखती हुई केंद्रीय पत्ती या चोटी के हिस्से में कीट क्षति दिखाई दे तो पौधों की जांच करनी चाहिए। बक्शी राम ने भी प्रभावित गन्ने को खेत से निकालकर बाहर करने की सलाह दी है।
रासायनिक नियंत्रण का फैसला कीट की स्थिति और स्थानीय कृषि सलाह के आधार पर होना चाहिए। बिना समस्या की पहचान किए बार-बार कीटनाशक का इस्तेमाल करना उचित नहीं है। फसल की नियमित निगरानी और शुरुआती अवस्था में कार्रवाई ज्यादा महत्वपूर्ण है।
लाल सड़न के मामले में सावधानी जरूरी
CO 0238 को उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में प्रचलित लाल सड़न की कुछ नस्लों के प्रति मध्यम प्रतिरोधी पाया गया है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि फसल लाल सड़न से पूरी तरह सुरक्षित है।
रोग प्रबंधन में स्वस्थ बीज का चयन सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। खेत में रोगग्रस्त पौधों को पहचानकर उन्हें स्वस्थ फसल से अलग रखना चाहिए। एक ही खेत में लगातार खराब प्रदर्शन करने वाली फसल से बीज लेना जोखिम बढ़ा सकता है।
किसी खेत में बीमारी का स्पष्ट प्रकोप दिखाई दे तो अगले मौसम की योजना बनाते समय स्थानीय कृषि वैज्ञानिक या गन्ना विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है। केवल किस्म की रोग सहनशीलता पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है।
रैटून फसल के लिए भी CO 0238 में अच्छी संभावना
CO 0238 की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसकी रैटून क्षमता है। अनुसंधान में इसे उपोष्णकटिबंधीय परिस्थितियों में दूसरी रैटून तक लेने के लिए उपयुक्त पाया गया है। सर्दियों में कटाई के बाद भी इसके ठूंठों से अच्छी फुटाव क्षमता दर्ज की गई है।
लेकिन हर खेत में रैटून फसल समान परिणाम देगी, ऐसा मानना सही नहीं होगा। इसके लिए पहली फसल का स्वास्थ्य, कटाई का समय, खेत की नमी, ठूंठ की स्थिति और कीट तथा रोगों की स्थिति देखना जरूरी है।
रैटून लेने का फैसला करते समय कमजोर, रोगग्रस्त या बहुत असमान खेत को आगे बढ़ाने के बजाय खेत की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन करना चाहिए। अच्छी पहली फसल और स्वस्थ ठूंठ रैटून की बेहतर शुरुआत के लिए महत्वपूर्ण हैं।
CO 0238 की खेती में सबसे बड़ी गलती क्या हो सकती है
CO 0238 की लोकप्रियता के कारण कई किसान केवल इसकी उपज क्षमता देखकर इसे हर परिस्थिति में लगाने की कोशिश करते हैं। जबकि यह किस्म मूल रूप से उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र की परिस्थितियों के लिए जारी की गई थी और बाद में दूसरे क्षेत्रों में भी इसका विस्तार हुआ। इसलिए किसी भी इलाके में इसकी उपयुक्तता स्थानीय कृषि परिस्थितियों और वर्तमान क्षेत्रीय सलाह के आधार पर देखनी चाहिए।
दूसरी बड़ी गलती कीट प्रबंधन में देरी करना है। खास तौर पर टॉप बोरर के मामले में पौधे पर स्पष्ट नुकसान दिखाई देने तक इंतजार करना नुकसान बढ़ा सकता है।
तीसरी गलती बिना मिट्टी जांच के लगातार खाद डालना है। अधिक मात्रा में खाद देने से जरूरी नहीं कि उत्पादन उसी अनुपात में बढ़ जाए। संतुलित पोषण और खेत की वास्तविक जरूरत को समझना ज्यादा जरूरी है।
अधिक उपज के लिए किस बात पर सबसे ज्यादा ध्यान दें
CO 0238 को विकसित करने का उद्देश्य ऐसी किस्म तैयार करना था जिसमें गन्ने की अच्छी उपज के साथ बेहतर चीनी गुणवत्ता भी मिले। उपलब्ध परीक्षणों में इस किस्म ने दोनों क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन किया है। यही कारण है कि यह उत्तर भारत की गन्ना खेती में लंबे समय तक महत्वपूर्ण किस्म बनी रही।
किसान के लिए इसका सीधा मतलब यह है कि अच्छी किस्म के साथ अच्छी खेती तकनीक भी जरूरी है। स्वस्थ बीज, सही खेत तैयारी, संतुलित खाद, उचित सिंचाई, खरपतवार नियंत्रण, समय पर कीट निगरानी और रोगग्रस्त पौधों की पहचान को एक साथ अपनाने से फसल की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।
निष्कर्ष
CO 0238 यानी Karan 4 ने उत्तर भारत में गन्ने की खेती को काफी प्रभावित किया है। इसकी अधिक उपज क्षमता, जल्दी पकने की विशेषता, बेहतर चीनी गुणवत्ता और अच्छी रैटून क्षमता इसके प्रमुख गुण हैं। इसे विकसित करने में डॉ. बक्शी राम और उनकी टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
हालांकि किसी भी किस्म की सफलता केवल उसके नाम पर निर्भर नहीं करती। CO 0238 में खास तौर पर स्वस्थ बीज, मिट्टी परीक्षण आधारित पोषण, संतुलित सिंचाई, जल निकास और टॉप बोरर की नियमित निगरानी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। किसानों के लिए सबसे अहम संदेश यही है कि अच्छी किस्म के साथ सही प्रबंधन अपनाया जाए, तभी खेत में उसकी वास्तविक उत्पादन क्षमता हासिल करने की संभावना बढ़ती है।