धान की फसल में रोपाई के बाद कल्ले निकलना पौधों की आगे की बढ़वार के लिए बेहद महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। अगर इस समय पौधे स्वस्थ होने के बावजूद नए कल्ले नहीं बना रहे हैं, तो इसका असर आगे चलकर पौधों की संख्या और बालियां बनने की क्षमता पर पड़ सकता है।
कल्ले कम निकलने के पीछे केवल खाद की कमी ही जिम्मेदार नहीं होती। नाइट्रोजन का असंतुलन, खेत में पानी का सही प्रबंधन न होना और जिंक जैसे जरूरी पोषक तत्वों की कमी भी इसकी वजह बन सकती है। इसलिए समस्या दिखाई देते ही कारण पहचानना जरूरी है, ताकि बिना जरूरत खाद या दवा का इस्तेमाल न किया जाए।
कल्ले निकलना धान की फसल के लिए क्यों जरूरी है
धान के पौधे रोपाई या अंकुरण के बाद एक निश्चित अवस्था में मुख्य तने के आसपास से नए तने निकालते हैं, जिन्हें कल्ले कहा जाता है। आगे चलकर इन्हीं कल्लों में से उपज देने वाली बालियां विकसित होती हैं। इसलिए खेत में पौधों की स्थिति देखते समय केवल पौधे की ऊंचाई पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह भी देखना जरूरी है कि पौधा सक्रिय रूप से नए कल्ले बना रहा है या नहीं।
अगर कल्ले निकलने की अवस्था में पौधों की बढ़वार धीमी हो जाए, तो खेत में पौधों का फैलाव कमजोर दिखाई दे सकता है। ऐसी स्थिति में बाद की अवस्था में फसल को सामान्य बढ़वार तक पहुंचाने में कठिनाई हो सकती है। हालांकि कल्ले बनने की संख्या किस्म, रोपाई की उम्र, पौधों की दूरी, मिट्टी, पोषण और मौसम जैसी कई परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
पहला बड़ा कारण नाइट्रोजन की कमी या खाद का असंतुलन
धान में हरी पत्तियों और पौधे की सक्रिय बढ़वार के लिए नाइट्रोजन महत्वपूर्ण पोषक तत्व है। अगर मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन कम है या फसल को जरूरत के समय नाइट्रोजन नहीं मिल पा रही है, तो पौधों की बढ़वार कमजोर पड़ सकती है और कल्ले निकलने की गति प्रभावित हो सकती है।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कल्ले कम दिखाई देने पर किसान तुरंत अधिक यूरिया डाल दे। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन देना भी संतुलित पोषण का विकल्प नहीं है। सही मात्रा और सही समय पर पोषक तत्व देना ज्यादा महत्वपूर्ण है। कृषि सलाह में नाइट्रोजन को फसल की अलग-अलग अवस्थाओं के अनुसार बांटकर देने पर जोर दिया जाता है।
इसलिए अगर खेत में पौधे हल्के हरे दिखाई दे रहे हैं, उनकी बढ़वार कमजोर है और साथ ही कल्ले भी कम बन रहे हैं, तो पोषण की स्थिति पर ध्यान देना चाहिए। मिट्टी की जांच उपलब्ध हो तो उसके आधार पर खाद प्रबंधन करना ज्यादा बेहतर तरीका है।
दूसरा बड़ा कारण पानी का गलत प्रबंधन
धान पानी पसंद करने वाली फसल है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर समय खेत में बहुत अधिक पानी भरा रहना चाहिए। खेत की मिट्टी, फसल की अवस्था और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पानी का प्रबंधन करना जरूरी है। बहुत ज्यादा पानी, लंबे समय तक जलभराव या दूसरी ओर पर्याप्त नमी न मिलना, दोनों ही पौधों की सामान्य बढ़वार को प्रभावित कर सकते हैं।
कल्ले निकलने की अवस्था में खेत की स्थिति पर नियमित नजर रखना इसलिए जरूरी है। खासकर जहां खेत में पानी की निकासी कमजोर है, वहां लगातार जलभराव से जड़ों के आसपास की परिस्थितियां खराब हो सकती हैं। दूसरी तरफ पानी की कमी से पौधे तनाव में आ सकते हैं और उनकी बढ़वार धीमी पड़ सकती है।
खाद डालते समय भी पानी की स्थिति का ध्यान रखना जरूरी है। कृषि सलाह में टॉप ड्रेसिंग के दौरान खेत की स्थिति को ध्यान में रखने और खाद के उपयोग की दक्षता बढ़ाने के लिए उचित जल प्रबंधन की सलाह दी जाती है।
तीसरा बड़ा कारण जिंक और दूसरे पोषक तत्वों की कमी
कई बार किसान कल्ले कम निकलने की समस्या को केवल नाइट्रोजन की कमी समझ लेते हैं, जबकि मिट्टी में जिंक जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी भी धान की बढ़वार को प्रभावित कर सकती है। अलग-अलग क्षेत्रों की मिट्टी में पोषक तत्वों की उपलब्धता अलग होती है और कुछ इलाकों में जिंक की कमी धान उत्पादन की प्रमुख बाधाओं में शामिल रही है।
जिंक की कमी होने पर पौधों की सामान्य बढ़वार प्रभावित हो सकती है और पत्तियों तथा पौधे के विकास में असामान्य लक्षण दिखाई दे सकते हैं। ऐसी स्थिति में बिना जांच के बार-बार अलग-अलग पोषक तत्व डालना उचित नहीं माना जाता। मिट्टी की जांच और खेत में दिखाई देने वाले लक्षणों के आधार पर पोषण संबंधी समस्या की पहचान करना ज्यादा सुरक्षित तरीका है।
कल्ले कम निकलने के साथ यदि पौधों की बढ़वार भी असामान्य दिखाई दे रही है, तो केवल यूरिया बढ़ाने के बजाय मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए।
खेत में समस्या पहचानते समय इन बातों पर दें ध्यान
कल्ले कम निकलने की समस्या का कारण समझने के लिए किसान को पूरे खेत की स्थिति देखनी चाहिए। केवल एक-दो पौधों को देखकर खाद की मात्रा तय करना सही तरीका नहीं है। खेत के अलग-अलग हिस्सों में पौधों की बढ़वार, पत्तियों का रंग, मिट्टी में नमी और पानी की स्थिति को देखना चाहिए।
- पौधों का रंग सामान्य हरेपन से हल्का पड़ रहा है या नहीं, यह देखें।
- अलग-अलग हिस्सों में पानी जमा है या कहीं मिट्टी ज्यादा सूखी है, इसकी जांच करें।
- पौधों की बढ़वार के साथ कल्लों की संख्या भी देखें।
- जिंक या अन्य पोषक तत्वों की कमी का संदेह होने पर मिट्टी की जांच और कृषि विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता दें।
केवल यूरिया डालना हर समस्या का समाधान नहीं
धान में कल्ले कम निकलने पर सबसे आम गलती यह होती है कि किसान तुरंत अधिक यूरिया डालने लगते हैं। अगर समस्या वास्तव में नाइट्रोजन की कमी से जुड़ी है तो संतुलित नाइट्रोजन प्रबंधन मददगार हो सकता है, लेकिन यदि खेत में पानी की समस्या या किसी सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी है तो केवल यूरिया डालने से अपेक्षित सुधार नहीं मिलेगा।
इसी तरह जिंक की कमी होने पर भी बिना जरूरत नाइट्रोजन बढ़ाते जाना सही समाधान नहीं है। खाद का चुनाव फसल की अवस्था, मिट्टी की स्थिति और पहले से किए गए पोषण प्रबंधन को ध्यान में रखकर होना चाहिए। जहां संभव हो, मिट्टी की जांच के आधार पर पोषक तत्वों का प्रबंधन करना सबसे बेहतर तरीका है।
समय पर ध्यान देने से समस्या को बढ़ने से रोका जा सकता है
धान में कल्ले निकलने की अवस्था को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस समय पौधों की बढ़वार कमजोर दिखाई दे रही हो तो किसान को पहले यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि समस्या पोषण से जुड़ी है, पानी से या मिट्टी में किसी जरूरी तत्व की कमी से।
खेत की नियमित निगरानी करने से समस्या का शुरुआती स्तर पर पता लगाया जा सकता है। इसके बाद जरूरत के अनुसार खाद और पानी का प्रबंधन किया जा सकता है। किसी एक लक्षण को देखकर तुरंत अधिक खाद या रसायन डालने के बजाय समस्या के वास्तविक कारण की पहचान करना ज्यादा जरूरी है।
निष्कर्ष
धान में कल्ले कम निकलना फसल की सामान्य बढ़वार के लिए चिंता का संकेत हो सकता है, लेकिन इसका कारण हर खेत में एक जैसा नहीं होता। नाइट्रोजन की कमी या असंतुलन, पानी का गलत प्रबंधन और जिंक जैसे जरूरी पोषक तत्वों की कमी इसके प्रमुख कारणों में शामिल हो सकते हैं।
इसलिए किसान को कल्ले कम दिखाई देने पर सबसे पहले पौधों की स्थिति, मिट्टी की नमी, खेत में पानी की स्थिति और पोषक तत्वों की उपलब्धता को देखना चाहिए। सही कारण की पहचान करके समय पर सुधार किया जाए तो फसल की बढ़वार को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिना कारण जाने केवल यूरिया या किसी अन्य खाद की मात्रा बढ़ाने के बजाय संतुलित और जरूरत आधारित पोषण प्रबंधन अपनाया जाए।