देशभर के गन्ना किसानों के लिए नया पेराई सत्र शुरू हो चुका है और इस समय किसानों के बीच सबसे बड़ी चर्चा गन्ने के दाम को लेकर हो रही है। खेती की बढ़ती लागत को देखते हुए किसान भाई इस उम्मीद में हैं कि सरकार इस बार गन्ने के दामों में अच्छी बढ़ोतरी करेगी ताकि उन्हें अपनी मेहनत का सही मुनाफा मिल सके। केंद्र सरकार की ओर से गन्ने का न्यूनतम दाम तय होने के बाद अब अलग-अलग राज्यों में भी गन्ने का भाव बढ़ाने को लेकर मांग बहुत तेज हो गई है।
केंद्र सरकार द्वारा तय किया गया नया एफआरपी
केंद्र सरकार ने नए चीनी सत्र के लिए उचित और लाभकारी मूल्य यानी एफआरपी में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। सरकार की तरफ से गन्ने की बुनियादी रिकवरी दर के आधार पर प्रति क्विंटल गन्ने का एक न्यूनतम दाम तय किया जाता है, जिससे कम भुगतान कोई भी चीनी मिल किसानों को नहीं कर सकती है। इस नए पेराई सत्र में सरकार ने पिछले साल के मुकाबले दाम में ₹10 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी करने का फैसला किया है।
इस साल केंद्र की तरफ से तय की गई दरें और पिछले साल के मुकाबले आए बदलाव को आप इस तरह आसानी से समझ सकते हैं। सरकार के इस फैसले से देश के करोड़ों गन्ना किसानों को सीधा फायदा पहुंचने की उम्मीद है।
गन्ने के केंद्रीय मूल्य का पूरा विवरण नीचे दी गई तालिका में दिया गया है:
| विषय | तय की गई दर और नियम |
|---|---|
| नया एफआरपी (वर्ष 2026-27) | ₹365 प्रति क्विंटल |
| पुरानी दर (वर्ष 2025-26) | ₹355 प्रति क्विंटल |
| बुनियादी रिकवरी दर | 10.25 प्रतिशत |
| न्यूनतम सुनिश्चित मूल्य | ₹338.30 प्रति क्विंटल (कम रिकवरी वाले क्षेत्रों के लिए) |
राज्य सरकारों के स्तर पर एसएपी की स्थिति
उत्तर भारत के कई प्रमुख राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा केंद्र के दाम से अलग अपना एक राज्य परामर्शित मूल्य यानी एसएपी तय करते हैं। राज्यों द्वारा तय किया जाने वाला यह दाम हमेशा केंद्र के एफआरपी से ज्यादा होता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश सरकार ने गन्ने के दाम में ₹30 की बढ़ोतरी की थी, जिसके बाद वहां अगेती किस्म के गन्ने का भाव ₹400 प्रति क्विंटल तक पहुंच गया था।
इस बार भी नया पेराई सत्र शुरू होने से पहले ही अलग-अलग राज्यों में किसान संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से गन्ने का दाम बढ़ाने के लिए लगातार मांग की जा रही है। किसान भाइयों का कहना है कि खाद, कीटनाशक, जुताई और मजदूरी का खर्च काफी ज्यादा बढ़ गया है, इसलिए राज्य सरकारों को इस बार भी गन्ने के भाव में अच्छी वृद्धि करनी चाहिए ताकि किसानों की जेब पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।
किसानों की मांग और उनकी प्रमुख चिंताएं
नए पेराई सत्र के दौरान किसानों की सिर्फ गन्ने के दाम को लेकर ही मांग नहीं है, बल्कि वे अपनी कुछ पुरानी समस्याओं का भी पक्का समाधान चाहते हैं। किसान संगठन इस बात पर जोर दे रहे हैं कि जब तक गन्ने का भाव ₹500 से ₹600 प्रति क्विंटल के आसपास नहीं पहुंचेगा, तब तक खेती का पूरा खर्च निकालना बहुत मुश्किल होगा।
गन्ना किसानों की प्रमुख मांगें और उनकी चिंताएं कुछ इस प्रकार हैं:
- गन्ने की फसल का सरकारी दाम बढ़ाकर कम से कम ₹500 से ₹600 प्रति क्विंटल किया जाए ताकि लागत निकल सके।
- चीनी मिलों में गन्ने की तौल शुरू होने के बाद किसानों को उनके बकाये का भुगतान तय समय सीमा के भीतर किया जाए।
- पिछले पेराई सत्र का जो भी पुराना भुगतान रुका हुआ है, उसे तुरंत ब्याज के साथ किसानों के खातों में ट्रांसफर किया जाए।
- मिलों की तरफ से पर्चियों के वितरण में पूरी पारदर्शिता रखी जाए ताकि छोटे किसानों को किसी तरह की परेशानी न हो।
गन्ने की सप्लाय और भुगतान की ऑनलाइन ट्रैकिंग
आजकल गन्ना किसानों की सुविधा के लिए पूरी व्यवस्था को ऑनलाइन कर दिया गया है। किसान भाई अपने गन्ने की पर्ची, सप्लाय कैलेंडर, सर्वे डेटा और भुगतान की स्थिति घर बैठे ही अपने मोबाइल फोन पर देख सकते हैं। इससे किसानों को मिलों या दफ्तरों के चक्कर काटने से मुक्ति मिल गई है और किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका बहुत कम हो गई है।
उत्तर प्रदेश के किसान भाई अपने गन्ने की पर्ची और सप्लाय से जुड़ी किसी भी प्रकार की जानकारी प्राप्त करने के लिए राज्य सरकार के आधिकारिक गन्ना पोर्टल Cane UP Enquiry पर जा सकते हैं। इस पोर्टल पर अपना सोसाइटी और विलेज कोड डालकर किसान अपनी हर समस्या का स्टेटस देख सकते हैं। डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बाद से किसानों को समय पर पर्चियां मिलने में काफी मदद मिली है।
निष्कर्ष और आगे की राह
गन्ने के रेट में होने वाली बढ़ोतरी सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। केंद्र सरकार की ओर से एफआरपी में ₹10 की बढ़ोतरी के बाद अब सभी की नजरें राज्य सरकारों के अंतिम फैसलों पर टिकी हुई हैं। उम्मीद की जा रही है कि पेराई सत्र पूरी तरह रफ्तार पकड़ने से पहले राज्य सरकारें भी किसानों के हित में कोई बड़ा फैसला ले सकती हैं, जिससे किसानों को इस साल अपनी फसल का बेहतर और वाजिब दाम मिल सकेगा।
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